Ādi-parva, Adhyāya 73: Devayānī–Śarmiṣṭhā Dispute, Confinement in the Well, and Yayāti’s Rescue
भगवांस्तपसा युक्त: श्रुत्वा कि नु करिष्यति । एवं स चिन्तयन्नेव प्रविवेश स्वकं पुरम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! इस प्रकार शकुन्तलासे प्रतिज्ञा करके नरेश्वर राजा दुष्यन्त आश्रमसे चल दिये। उनके मनमें महर्षि कण्वकी ओरसे बड़ी चिन्ता थी कि तपस्वी भगवान् कण्व यह सब सुनकर न जाने क्या कर बैठेंगे? इस तरह चिन्ता करते हुए ही राजाने अपने नगरमें प्रवेश किया
bhagavāṁs tapasā yuktaḥ śrutvā ki nu kariṣyati | evaṁ sa cintayann eva praviveśa svakaṁ puram |
বৈশম্পায়নে ক’লে—তপোবলে যুক্ত ভগৱান কণ্বে এই কথা শুনিলে কি কৰিব, কোনে জানে—এইদৰে চিন্তা কৰোঁতেই ৰজা নিজৰ নগৰত প্ৰৱেশ কৰিলে।
वैशम्पायन उवाच