Āstīka-stuti at Janamejaya’s Sacrifice (आस्तीकस्तुतिः / यज्ञप्रशंसा)
ब्रह्माणं समुपागम्य मुनि: पूजां चकार ह | सोअ&नुज्ञातस्ततस्तत्र शृद्धी शुश्राव तं तदा,एक दिन उसने आचार्यदेवके समीप जाकर पूजा की और उनकी आज्ञा ले वह घरको लौटा। उसी समय शृंगी ऋषिने अपने एक सहपाठी मित्रके मुखसे तुम्हारे पिताद्वारा अपने पिताके तिरस्कृत होनेकी बात सुनी। राजसिंह! शृंगीको यह मालूम हुआ कि मेरे पिता काठकी भाँति चुपचाप बैठे थे और उनके कंधेपर मृतक साँप डाल दिया गया। वे अब भी उस सर्पको अपने कंधेपर रखे हुए हैं। यद्यपि उन्होंने कोई अपराध नहीं किया था। वे मुनिश्रेष्ठ तपस्वी, जितेन्द्रिय, विशुद्धात्मा, कर्मनिष्ठ, अद्भुत शक्तिशाली, तपस्याद्वारा कान्तिमान् शरीरवाले, अपने अंगोंको संयममें रखनेवाले, सदाचारी, शुभवक्ता, निश्चल भावसे स्थित, लोभरहित, क्षुद्रताशून्य (गम्भीर), दोषदृष्टिसे रहित, वृद्ध, मौनव्रतावलम्बी तथा सम्पूर्ण प्राणियोंको आश्रय देनेवाले थे, तो भी आपके पिता परीक्षित्ने उनका तिरस्कार किया
brahmāṇaṃ samupāgamya muniḥ pūjāṃ cakāra ha | so 'nujñātas tatas tatra śṛṅgī śuśrāva taṃ tadā ||
জনমেজয়ে ক’লে—এদিন সি (শৃঙ্গী) আচার্যদেৱৰ ওচৰলৈ গৈ পূজা কৰিলে; আৰু তাত অনুমতি পোৱাৰ লগে লগে, সেই সময়তে সি শুনিলে যে তোমাৰ পিতাই তাৰ পিতাক অপমান কৰিছিল। নিৰ্দোষ, মৌনব্ৰতস্থ তপস্বীক তুচ্ছজ্ঞান কৰা এই অবজ্ঞাই পৰৱৰ্তী মহা পৰিণামৰ বীজ হ’ল।
जनमेजय उवाच