Ādi-parva Adhyāya 3 — Janamejaya’s Rite, Dhaumya’s Parīkṣā, and Uttanka’s Kuṇḍala Quest (सर्पसत्रप्रस्तावना–गुरुपरीक्षा–उत्तङ्कोपाख्यान)
स पौष्यं पुनरुवाच न युक्त भवताहमनृतेनोपचरितुं न हि तेडन्तःपुरे क्षत्रिया सन्निहिता नैनां पश्यामि,तब वे पुनः राजा पौष्यके पास आकर बोले--'राजन्! आप मुझे संतुष्ट करनेके लिये झूठी बात कहकर मेरे साथ छल करें, यह आपको शोभा नहीं देता है। आपके अन्तःपुरमें क्षत्राणी नहीं हैं, क्योंकि वहाँ वे मुझे नहीं दिखायी देती हैं"
sa pauṣyaṁ punar uvāca na yuktaṁ bhavatāham anṛtenopacaritum na hi teḍantaḥpure kṣatriyā sannihitā naināṁ paśyāmi
তেতিয়া উত্তঙ্ক পুনৰ ৰজা পৌষ্যৰ ওচৰলৈ আহি ক’লে—“ৰাজন! মোক সন্তুষ্ট কৰিবলৈ মিছা কথা কৈ মোৰ সৈতে ছল কৰা আপোনাৰ শোভা নাপায়। আপোনাৰ অন্তঃপুৰত ক্ষত্ৰাণী উপস্থিত নাই; মই তেওঁক তাত দেখা নাই।”
राम उवाच