न हि पक्षवता न्याय्यं निःस्नेहेन सुहृज्जने । पीड्यमान उपद्रष्टूं शक्तेनात्मा कथंचन,“जो सहायकोंसे सम्पन्न और शक्तिशाली है” वह मुझ-जैसे अपने सुहृद् व्यक्तिपर स्नेह नहीं रखे और अपने आत्मीय जनको पीड़ित देखकर उसकी उपेक्षा करे, यह किसी प्रकार उचित नहीं कहा जा सकता
“যি সহায়কে সমৃদ্ধ আৰু শক্তিমান, তাৰ পক্ষে সুহৃদজনৰ প্ৰতি স্নেহহীন হোৱা, আৰু নিজৰ আত্মীয় পীড়িত হ’লে তাক দেখি উপেক্ষা কৰা—কোনোমতেই ন্যায়্য নহয়।”
वैशम्पायन उवाच