मन्दपाल उवाच किमर्थमावृता लोका ममैते तपसार्जिता: । कि मया न कृतं तत्र यस्यैतत् कर्मण: फलम्,मन्दपाल बोले--देवताओ! मेरी तपस्याद्वारा प्राप्त हुए ये लोक बंद क्यों हैं? (उपभोगके साधनोंसे शून्य क्यों हैं?) मैंने वहाँ कौन-सा सत्कर्म नहीं किया है, जिसका फल मुझे इस रूपमें मिला है
মন্দপাল ক’লে—হে দেৱগণ! মোৰ তপস্যাৰে অৰ্জিত এই লোকসমূহ কিয় আৱৃত (ঢকা) হৈ আছে? মই তাত এনে কোন সৎকৰ্ম নকৰিলোঁ, যাৰ ফলত এই ৰূপে কৰ্মফল মোক লাভ হৈছে?
मन्दपाल उवाच