तदपाक्रियते सर्व यज्ञेन तपसा श्रुतैः । तपस्वी यज्ञकृच्चासि न च ते विद्यते प्रजा,देवताओंने कहा--ब्रह्मन! मनुष्य जिस ऋणसे ऋणी होकर जन्म लेते हैं, उसे सुनिये। यज्ञकर्म, ब्रह्मचर्यपालन और प्रजाकी उत्पत्ति--इन तीनोंके लिये सभी मनुष्योंपर ऋण रहता है, इसमें संशय नहीं है। यज्ञ, तपस्या और वेदाध्ययनके द्वारा वह सारा ऋण दूर किया जाता है। आप तपस्वी और यज्ञकर्ता तो हैं ही, आपके कोई संतान नहीं है
tad apākriyate sarvaṁ yajñena tapasā śrutaiḥ | tapasvī yajñakṛc cāsi na ca te vidyate prajā ||
সেই সকলো ঋণ যজ্ঞ, তপস্যা আৰু বেদাধ্যয়নেৰে দূৰ হয়। আপুনি তপস্বী আৰু যজ্ঞকাৰী বটে; কিন্তু আপোনাৰ সন্তান নাই।
मन्दपाल उवाच