अग्निभय-प्रसङ्गे मन्दपालस्य शोकः
Mandapāla’s Lament amid the Threat of Fire
स तं नानापताकाभि: शोभितं रथसत्तमम्,आरुरोह तदा पार्थों विमान सुकृती यथा । वह श्रेष्ठ रथ भाँति-भाँतिकी पताकाओंसे सुशोभित हो रहा था। अर्जुनने कमर कस ली, कवच और तलवार बाँध ली, दस्ताने पहन लिये तथा रथकी परिक्रमा और देवताओंको प्रणाम करके वे उसपर आरूढ़ हुए, ठीक वैसे ही, जैसे कोई पुण्यात्मा विमानपर बैठता है
sa taṃ nānāpatākābhiḥ śobhitaṃ rathasattamam ārurōha tadā pārtho vimānaṃ sukṛtī yathā |
বৈশম্পায়নে ক’লে—নানাবিধ পতাকাৰে শোভিত সেই ৰথসত্তমত তেতিয়া পাৰ্থ (অৰ্জুন) আৰূঢ় হ’ল—যেন কোনো পুণ্যবান ব্যক্তি বিমানে আৰোহণ কৰে।
वैशम्पायन उवाच