प्रभासे कृष्णार्जुनसमागमः तथा द्वारकाप्रवेशः | Kṛṣṇa–Arjuna Meeting at Prabhāsa and Entry into Dvārakā
मुहूर्तमिव संचिन्त्य कर्तव्यस्य च निश्चयम् । तयोरवधं समुद्दिश्य विश्वकर्माणमाह्दयत्,वहाँ भगवान् महादेव, वायुसहित अग्निदेव, चन्द्रमा, सूर्य, इन्द्र, ब्रह्मपुत्र महर्षि, वैखानस (वनवासी), बालखिल्य, वानप्रस्थ, मरीचिप, अजन्मा, अविमूढ़ तथा तेजोगर्भ आदि नाना प्रकारके तपस्वी मुनि ब्रह्माजीके पास आये थे। उन सभी महर्षियोंने निकट जाकर दीनभावसे ब्रह्माजीसे सुन्द-उपसुन्दके सारे क्रूर कर्मोंका वृत्तान्त कह सुनाया। दैत्योंने जिस प्रकार लूट-पाट की, जैसे-जैसे और जिस क्रमसे लोगोंकी हत्याएँ कीं, वह सब समाचार पूर्णरूपसे ब्रह्माजीको बताया। तब सम्पूर्ण देवताओं और महर्षियोंने भी इस बातको लेकर ब्रह्माजीको प्रेरणा की। ब्रह्माजीने उन सबकी बातें सुनकर दो घड़ीतक कुछ विचार किया। फिर उन दोनोंके वधके लिये कर्तव्यका निश्चय करके विश्वकर्माको बुलाया
muhūrtam iva sañcintya kartavyasya ca niścayam | tayor avadhaṃ samuddiśya viśvakarmāṇam āhvayat ||
অলপ সময় চিন্তা কৰি কৰ্তব্যৰ নিশ্চয় স্থিৰ কৰি, সেই দুজনৰ বধক লক্ষ্য কৰি ব্ৰহ্মাই বিশ্বকৰ্মাক আহ্বান কৰিলে।
नारद उवाच