Adhyāya 196: Droṇa’s Conciliatory Counsel and Karṇa’s Suspicion of Counsel (मन्त्र-नय-विवादः)
ये ते पूर्व शक्ररूपा निबद्धा- स्तस्यां दर्या पर्वतस्योत्तरस्यथ । इहैव ते पाण्डवा वीर्यवन्त: शक्रस्यथांश: पाण्डव: सव्यसाची,उत्तरवर्ती हिमालयकी कन्दरामें पहले जो इन्द्रस्वरूप पुरुष बंदी बनाकर रखे गये थे, वे ही चारों पराक्रमी पाण्डव यहाँ विद्यमान हैं और साक्षात् इन्द्रका अंशभूत जो पाँचवाँ पुरुष प्रकट होनेवाला था, वही पाण्डुकुमार सव्यसाची अर्जुन है
ye te pūrva-śakra-rūpā nibaddhās tasyāṁ daryā parvatasyottarasya | ihaiva te pāṇḍavā vīryavantaḥ śakrasyāṁśaḥ pāṇḍavaḥ savyasācī ||
ব্যাসে ক’লে—উত্তৰ পৰ্বতৰ সেই গুহাত পূৰ্বে ইন্দ্ৰ-সদৃশ ৰূপ ধৰি যিসকল পুৰুষ বাঁধি ৰখা হৈছিল, তেওঁলোকেই এই বীৰ্যৱান পাণ্ডৱসকল ইয়াত উপস্থিত। আৰু যিজন পঞ্চম পুৰুষ ইন্দ্ৰৰ সাক্ষাৎ অংশ্যৰূপে প্ৰকাশ পাবলগীয়া আছিল, তেওঁই পাণ্ডুপুত্ৰ সব্যসাচী অৰ্জুন।
व्यास उवाच