उच्चैःश्रवसः वर्णविपणः तथा नागशापः
Uccaiḥśravas Color-Wager and the Nāga Curse
ऑपनआ कराता बछ। अं अष्टादशो<् ध्याय: देवताओं और 30020 22026 लिये समुद्रका मन्थन, अनेक रत्नोंके साथ उत्पत्ति और भगवानका मोहिनीरूप धारण करके दैत्योंके हाथसे अमृत ले लेना सौतिरुवाच ततो<भ्रशिखराकारैर्गिरिशृड्रैरलंकृतम् । मन्दरं पर्वतवरं लताजालसमाकुलम्,उग्रश्रवाजी कहते हैं--शौनकजी! तदनन्तर सम्पूर्ण देवता मिलकर पर्वतश्रेष्ठ मन्दराचलको उखाड़नेके लिये उसके समीप गये। वह पर्वत श्रेत मेघखण्डोंके समान प्रतीत होनेवाले गगनचुम्बी शिखरोंसे सुशोभित था। सब ओर फैली हुई लताओंके समुदायने उसे आच्छादित कर रखा था। उसपर चारों ओर भाँति-भाँतिके विहंगम कलरव कर रहे थे। बड़ी-बड़ी दाढ़ोंवाले व्याप्र-सिंह आदि अनेक हिंसक जीव वहाँ सर्वत्र भरे हुए थे। उस पर्वतके विभिन्न प्रदेशोंमें किन्नरगण, अप्सराएँ तथा देवतालोग निवास करते थे। उसकी ऊँचाई ग्यारह हजार योजन थी और भूमिके नीचे भी वह उतने ही सहस्र योजनोंमें प्रतिष्ठित था। जब देवता उसे उखाड़ न सके, तब वहाँ बैठे हुए भगवान् विष्णु और ब्रह्माजीसे इस प्रकार बोले--
śaunaka uvāca — tato 'bhrśikhara-ākāraiḥ giriśṛṅgair alaṅkṛtam | mandaraṃ parvata-varaṃ latā-jāla-samākulam ||
সৌতিয়ে ক’লে—তাৰ পিছত তেওঁলোকে মন্দৰ নামৰ পৰ্বতশ্ৰেষ্ঠৰ ওচৰলৈ গ’ল; যি মেঘশিখৰৰ দৰে উচ্চ গিৰিশৃংগেৰে অলংকৃত আৰু লতাজালেৰে আৱৃত আছিল।
शौनक उवाच
The verse highlights that momentous, dharma-aligned goals are pursued through collective resolve and by engaging powerful supports in the world (here, the great mountain Mandara), implying disciplined cooperation and purposeful use of strength.
The scene shifts to Mandara mountain, described as cloud-peaked and vine-covered, as the divine actors prepare to use it for the larger undertaking associated with the churning of the ocean.