पराशरस्य राक्षससत्रनिवृत्तिः | Paraśara’s Rakṣasa-Satra and Its Cessation
ददर्श विपुलश्रोणीं तामेवाभिमुखे स्थिताम् | अथ तामसितापाद्जीमाबभाषे स पार्थिव:,कुरुवंशका विस्तार करनेवाले राजा संवरण कामाग्निसे पीड़ित हो अचेत हो गये थे। उस समय जैसे कोई हँसकर मधुर वचन बोलता हो, उसी प्रकार कल्याणी तपती मीठी वाणीमें उन नरेशसे बोली--“शत्रुदमन! उठिये, उठिये; आपका कल्याण हो। राजसिंह! आप इस भूतलके विख्यात सम्राट् हैं। आपको इस प्रकार मोहके वशीभूत नहीं होना चाहिये।' तपतीने जब मधुर वाणीमें इस प्रकार कहा, तब राजा संवरणने आँखें खोलकर देखा। वही विशाल नितम्बोंवाली सुन्दरी सामने खड़ी थी। राजाके अन्तःकरणमें कामजनित आग जल रही थी। वे उस कजरारे नेत्रोंवाली सुन्दरीसे लड़खड़ाती वाणीमें बोले -- श्यामलोचने! तुम आ गयीं, अच्छा हुआ। यौवनके मदसे सुशोभित होनेवाली सुन्दरी! मैं कामसे पीड़ित तुम्हारा सेवक हूँ। तुम मुझे स्वीकार करो, अन्यथा मेरे प्राण मुझे छोड़कर चले जायँगे। विशालाक्षि! कमलके भीतरी भागकी-सी कान्तिवाली सुन्दरि! तुम्हारे लिये कामदेव मुझे अपने तीखे बाणोंद्वारा बार-बार घायल कर रहा है। यह (एक क्षणके लिये भी) शान्त नहीं होता। भद्रे! ऐसे समयमें जब मेरा कोई भी रक्षक नहीं है, मुझे कामरूपी महासर्पने डस लिया है
dadārśa vipulaśroṇīṃ tāmevābhimukhe sthitām | atha tāmasitāpāṅgīmābabhāṣe sa pārthivaḥ ||
তেওঁ সেই বহল নিতম্ববিশিষ্ট নাৰীকেই নিজৰ সন্মুখত থিয় হোৱা দেখিলে। তাৰ পাছত কামৰ চাপত বাক্য ডগমগাই উঠা অৱস্থাত, চকুৰ কোণত শ্যাম আভা থকা তেঁওক ৰজাই সম্বোধন কৰিলে।
गन्धर्व उवाच
The verse highlights how powerful desire can destabilize even a king; the ethical undertone is the need for inner restraint and clarity before acting, especially for those with responsibility and authority.
After hearing Tapatī’s words (in the surrounding passage), Saṃvaraṇa opens his eyes, sees her standing before him, and begins to address her—his speech shaped by intense longing and emotional agitation.