Ādi Parva, Adhyāya 146 — Brāhmaṇī’s counsel on grief, duty, and protection of children
पित्रा कनीयसा स्नेहाद् बुद्धिमन्तो$शिवं गृहम् । अनार्य: सुकृतं गूढैर्दु्योधनवशानुगै:,“गृहनिर्माणके कर्ममें सुशिक्षित एवं विश्वसनीय कारीगरोंने अवश्य ही घर बनाते समय सन, राल, मूँज, बल्वज (मोटे तिनकोंवाली घास) और बाँस आदि खब द्रव्योंको घीसे सींचकर बड़ी खूबीके साथ इन सबके द्वारा इस सुन्दर भवनकी रचना की है। यह मन्दबुद्धि पापी पुरोचन दुर्योधनकी आज्ञाके अधीन हो सदा इस घातमें लगा रहता है कि जब हमलोग विश्वस्त होकर सोये हों, तब वह आग लगाकर (घरके साथ ही) हमें जला दे। यही उसकी इच्छा है। भीमसेन! परम बुद्धिमान् विदुरजीने हमारे ऊपर आनेवाली इस विपत्तिको यथार्थरूपमें समझ लिया था; इसीलिये उन्होंने पहले ही मुझे सचेत कर दिया। विदुरजी हमारे छोटे पिता और सदा हमलोगोंका हित चाहनेवाले हैं। अतः उन्होंने स्नेहवश हम बुद्धिमानोंको इस अशिव (अमंगलकारी) गृहके सम्बन्धमें, जिसे दुर्योधनके वशवर्ती दुष्ट कारीगरोंने छिपकर कौशलसे बनाया है, पहले ही सब कुछ समझा दिया”
vaiśampāyana uvāca | pitrā kanīyasā snehād buddhimanto 'śivaṃ gṛham | anāryaḥ sukṛtaṃ gūḍhair duryodhanavaśānugaiḥ |
স্নেহবশত আমাৰ কনিষ্ঠ পিতা বিদুৰে—আমি বুজিব পৰা বুলি জানি—এই অশুভ গৃহৰ বিষয়ে আমাক সতৰ্ক কৰিছিল। দুযোধনৰ অধীন অনাৰ্য লোকসকলে ইয়াক গোপনে অতি কৌশলেৰে নিৰ্মাণ কৰাইছে।
वैशम्पायन उवाच