Vāraṇāvata-prasaṃsā and the Pāṇḍavas’ Departure (वरणावत-प्रशंसा तथा पाण्डव-प्रयाणम्)
वैशग्पायन उवाच द्रुपदेनैवमुक्तस्तु भारद्वाज: प्रतापवान् | मुहूर्त चिन्तयित्वा तु मन्युनाभिपरिष्लुत:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! राजा द्रुपदके यों कहनेपर प्रतापी द्रोण क्रोधसे जल उठे और दो घड़ीतक गहरी चिन्तामें डूबे रहे। वे बुद्धिमान् तो थे ही, पांचालनरेशसे बदला लेनेके विषयमें मन-ही-मन कुछ निश्चय करके कौरवोंकी राजधानी हस्तिनापुर नगरमें चले गये
vaiśampāyana uvāca | drupadenaivam uktas tu bhāradvājaḥ pratāpavān | muhūrtaṃ cintayitvā tu manyunābhipariṣlutaḥ |
বৈশম্পায়ন ক’লে—হে জনমেজয়! দ্রুপদে এনেদৰে কোৱাত প্ৰতাপৱান ভাৰদ্বাজপুত্ৰ দ্ৰোণ ক্ৰোধে আচ্ছন্ন হ’ল। অলপ সময় চিন্তাত নিমগ্ন হৈ, তেওঁৰ মন ক্ষোভে প্লাৱিত হৈ উঠিল।
वैशग्पायन उवाच