आदि पर्व, अध्याय 104 — कर्णोत्पत्ति, दानधर्म, वैकर्तन-नामकरण
Karna’s Birth, Gift-Ethic, and the Name Vaikartana
इमे महिष्यौ भ्रातुस्ते काशिराजसुते शुभे । रूपयौवनसम्पन्ने पुत्रकामे च भारत,“मेरा पुत्र और तुम्हारा भाई विचित्रवीर्य जो पराक्रमी होनेके साथ ही तुम्हें अत्यन्त प्रिय था, छोटी अवस्थामें ही स्वर्गवासी हो गया। नरश्रेष्ठ] उसके कोई पुत्र नहीं हुआ था। तुम्हारे भाईकी ये दोनों सुन्दरी रानियाँ, जो काशिराजकी कन्याएँ हैं, मनोहर रूप और युवावस्थासे सम्पन्न हैं। इनके ह्ृदयमें पुत्र पानेकी अभिलाषा है। भारत! तुम हमारे कुलकी संतानपरम्पराको सुरक्षित रखनेके लिये स्वयं ही इन दोनोंके गर्भसे पुत्र उत्पन्न करो। महाबाहो! मेरी आज्ञासे यह धर्मकार्य तुम अवश्य करो
ime mahiṣyau bhrātus te kāśirājasute śubhe | rūpayauvanasampanne putrakāme ca bhārata ||
হে ভাৰত! এই দুগৰাকী তোমাৰ ভ্ৰাতাৰ মহিষী—কাশীৰাজৰ শుభ কন্যাদ্বয়—ৰূপ আৰু যৌৱনে সমৃদ্ধ, আৰু পুত্ৰকামনাৰে আকুল।
वैशम्पायन उवाच