अनुक्रमणिकाध्यायः (Anukramaṇikā Adhyāya) — Invocation, Narrator Frame, and Textual Scope
यदाओष॑ श्रान्तहये धनज्जये मुक्त्वा हयान् पाययित्वोपवृत्तान् | पुनर्युक्त्वा वासुदेवं प्रयातं तदा नाशंसे विजयाय संजय,युद्धभूमिमें धनज्जय अर्जुनके घोड़े अत्यन्त श्रान्त और प्याससे व्याकुल हो रहे थे। स्वयं श्रीकृष्णने उन्हें रथसे खोलकर पानी पिलाया। फिरसे रथके निकट लाकर उन्हें जोत दिया और अर्जुनसहित वे सकुशल लौट गये। जब मैंने यह बात सुनी, संजय! तभी मेरी विजयकी आशा समाप्त हो गयी
yadāśu śrāntahaye dhanañjaye muktvā hayān pāyayitvopavṛttān | punar yuktvā vāsudevaṃ prayātaṃ tadā nāśaṃse vijayāya sañjaya ||
যেতিয়া মই শুনিলোঁ যে ধনঞ্জয় (অর্জুন)-ৰ ঘোঁৰাবোৰ অত্যন্ত ক্লান্ত হৈছিল; তেতিয়া বাসুদেৱ (শ্ৰীকৃষ্ণ) সিহঁতক খুলি পানী খুৱাই বিশ্ৰাম দিলে, পুনৰ জুৰি অৰ্জুনসহ কুশলে গ’ল আৰু উভতি আহিল—সঞ্জয়, তেতিয়াই মোৰ বিজয়ৰ আশা শেষ হ’ল।