Uttarā-Pratigrahaṇa and Abhimanyu–Uttarā Vivāha
Virāṭa-parva, Adhyāya 67
गच्छन्तु त्वरिताश्लैमे गोपाला: प्रेषितास्त्वया । नगरे प्रियमाख्यातुं घोषयन्तु च ते जयम्,क्षुत्पिपासापरिश्रान्ता विदेशस्था विचेतस: । जब कौरव-दलके लोग चले गये या इधर-उधर सब दिशाओंमें भाग गये, उस समय बहुत-से कौरवसैनिक जो घने जंगलमें छिपे हुए थे, वहाँसे निकलकर डरते-डरते अर्जुनके पास आये। उनके मनमें भय समा गया था। वे भूखे-प्यासे और थके-माँदे थे। परदेशमें होनेके कारण उनके हृदयकी व्याकुलता और बढ़ गयी थी। वे उस समय केश खोले और हाथ जोड़े हुए खड़े दिखायी दिये “तुम्हारे द्वारा भेजे हुए ये ग्वाले तुरंत नगरमें विजयका प्रिय संवाद सुनानेके लिये जाया और यह घोषित कर दें कि राजकुमार उत्तरकी जीत हुई है”
vaiśampāyana uvāca | gacchantu tvaritāślaime gopālāḥ preṣitās tvayā | nagare priyam ākhyātuṃ ghoṣayantu ca te jayam | kṣutpipāsāpariśrāntā videśasthā vicetasaḥ |
قال فايشَمبايانا: «فليذهب هؤلاء الرعاة الذين أرسلتَهم سريعًا إلى المدينة ليبلغوا الخبر السار. وليعلنوا على الملأ نصرك. فإن القوم جياعٌ عطاشٌ مُنهكون—حائرون في أرضٍ غريبة.»
वैशम्पायन उवाच