अध्याय ५०: उत्तरेण सह अर्जुनस्य रथप्रयाणे ध्वजचिह्नैः कौरवसेनानिर्देशः
Arjuna directs Uttara by identifying Kaurava commanders through banners
अऑडज आर (_) ऑपआ अपाय - जैसे कोई रथ बनानेवाला कारीगर रथ लाकर यह कहे कि मैंने इस दिव्य रथका निर्माण किया है। इसका प्रत्येक अंग सुदृढ़ है। इसपर बैठकर युद्ध करनेसे तुम देवताओंपर भी सर्वथा विजय पा सकोगे, तो केवल उसके इस कहनेपर भरोसा करके कोई बुद्धिमान् पुरुष युद्धके लिये तैयार न हो जायगा। उसी प्रकार कर्ण! केवल तुम्हारे इस डींग मारनेपर भरोसा करके देश-काल आदिका विचार किये बिना हमलोगोंका युद्धके लिये उद्यत होना ठीक नहीं है, यही कृपाचार्यके उपर्युक्त कथनका अभिप्राय है पज्चाशत्तमोडध्याय: अश्वत्थामाके उदगार अश्वत्थामोवाच न च तावज्जिता गावो न च सीमान्तरं गता: । न हास्तिनपुरं प्राप्तास्त्वं च कर्ण विकत्थसे,अश्वत्थामाने कहा--कर्ण! अभी तो हमने न गौओंको जीता है, न मत्स्यदेशकी सीमाके बाहर जा सके हैं और न हस्तिनापुरमें ही पहुँच गये हैं। फिर तुम इतनी व्यर्थ बकवाद क्यों कर रहे हो?
aśvatthāmovāca — na ca tāvajjitā gāvo na ca sīmāntaraṃ gatāḥ | na hāstinapuraṃ prāptās tvaṃ ca karṇa vikatthase ||
قال أَشْڤَتّھاما: «يا كَرْنَة، لم نَظْفَر بعدُ بالبقر، ولم نتجاوز حدود مَتْسْيَا، ولم نبلغ هَسْتِينابورا. فلماذا تتباهى بهذا العبث؟»
कृप उवाच