Mahabharata Adhyaya 4
Virata ParvaAdhyaya 458 Verses

Adhyaya 4

Dhaumya’s Counsel on Incognito Conduct in a Royal Household (राजवसतौ आचरण-निति)

Upa-parva: Ajñātavāsa-nīti (Guidance for Incognito Service in a Royal Household)

This chapter presents a planning dialogue as the Pandavas prepare for ajñātavāsa. Yudhiṣṭhira outlines logistical measures: safeguarding ritual fires through the family priest, directing certain attendants toward Dvāravatī, sending Draupadī’s women toward Pāñcāla, and standardizing the public account that the Pandavas have dispersed from Dvaitavana. Dhaumya then delivers an extended nīti discourse on how to reside safely in a king’s residence: avoid overfamiliarity and conspicuous privilege; do not volunteer counsel unless asked; restrain speech, laughter, and displays of confidence; avoid entanglement with the inner quarters; follow instructions without hesitation across conditions; maintain truthfulness and composure; and cultivate usefulness without provoking jealousy or suspicion. The unit closes with Yudhiṣṭhira acknowledging the guidance and requesting Dhaumya to execute the immediate rites of departure; Vaiśaṃpāyana notes Dhaumya’s ritual performance (agnihotra-related actions, oblations for prosperity and success) and the group’s departure with Draupadī in front.

Chapter Arc: अज्ञातवास की कठोर शर्तें सामने हैं—एक वर्ष तक पहचान छिपानी है; पाण्डव अपने-अपने वेश और सेवाकार्य चुनने को बाध्य हैं, और द्रौपदी के लिए भी सुरक्षित आश्रय तय करना है। → युधिष्ठिर नीति-निर्देश देते हैं: राजा से बिना पूछे उपदेश न देना, मौन रहकर सेवा करना, सदा सावधान रहना, और यह मानकर चलना कि ‘मैं राजा का प्रिय नहीं’—तभी हित और प्रिय दोनों साधे जा सकते हैं। साथ ही धौम्य, रसोइये, पाकशालाध्यक्ष, द्रौपदी की परिचारिकाएँ और सेवकों (इन्द्रसेन आदि) की अलग-अलग व्यवस्था तय होती है, ताकि किसी एक स्थान पर सबका संदेह न जगे। → अंततः छहों (पाँच पाण्डव और द्रौपदी) अग्नि और तपस्वी ब्राह्मणों की प्रदक्षिणा कर, याज्ञसेनी को अग्र में रखकर प्रस्थान करते हैं—यह क्षण उनके संकल्प, त्याग और जोखिम का सार्वजनिक (परंतु गुप्त) उद्घोष बन जाता है। → वीरों के चले जाने पर धौम्य अग्निहोत्र सामग्री सहित पाञ्चाल-देश की ओर प्रस्थान करते हैं; इन्द्रसेन आदि सेवक आदेशानुसार रथ-अश्वों की रक्षा करते हुए सुरक्षित ठिकाने (यादवों की नगरी/आश्रय) की ओर चले जाते हैं। इस प्रकार अज्ञातवास की ‘लॉजिस्टिक्स’ और आचार-संहिता स्थापित हो जाती है। → अब प्रश्न यह है कि विराट-नगर में ये छद्मवेश कितने दिन टिकेंगे—और कौन-सा संयोग सबसे पहले उनकी पहचान को संकट में डालेगा?

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २६ श्लोक मिलाकर कुल २५३ “लोक हैं।) #++ # ० ()) अपन असल ३. इस प्रसंगमें अर्जुनने अपनेको षण्ढक और बृहन्नला कहा है। षण्ढक शब्दका अर्थ है नपुंसक। अर्जुन इस समय उर्वशीके शापसे नपुंसक हो गये थे। बृहन्नलाका मूल शब्द बृहन्नल है। विद्वानोंने 'रर और “ल” को एक-सा माना है; अतः बृहन्नलका अर्थ बृहन्नर अर्थात्‌ श्रेष्ठ या महान्‌ मानव है। भगवान्‌ नारायणके सखा होनेके कारण अर्जुन नरश्रेष्ठ हैं ही। २. परिचारिकाका एक अर्थ है सेविका और दूसरा अर्थ है सब ओर विचरण करनेवाली। इस प्रकार अर्जुनने गूढ़ अभिप्राययुक्त परिचारिका शब्दद्वारा अपनेको द्रौपदीका पति सूचित किया है। - नकुलने अपना नाम ग्रन्थिक बताया और अपनेको अश्वोंका अधिकारी कहा है। ग्रन्थिकका अर्थ है आयुर्वेद तथा अध्वर्युविद्यासम्बन्धी ग्रन्थोंको जाननेवाला। श्रुतिमें अश्विनीकुमारोंको देवताओंका वैद्य तथा अध्वर्यु कहा गया है। 'अश्विनौ वै देवाना भिषजावश्चिनावध्वर्यू” | नकुल अश्विनीकुमारोंके पुत्र हैं; अतः उनका अपनेको ग्रन्थिक कहना उपयुक्त ही है। “नास्ति श्वो येषां ते अश्वा: जिनके कलतक जीवित रहनेकी आशा न हो

قال يودهيشثيرا: «لقد ذكر كلٌّ منكم ما سيتولّاه من أعمالٍ ونحن مقيمون في بيت فيرَاطا. وأنا أيضًا قلتُ ما بدا لي لائقًا بحسب تقديري. ويبدو أن ذلك هو عين ما قضاه القدر.»

Verse 2

पुरोहितो5यमस्माकमन्निहोत्राणि रक्षतु । सूदपौरोगवीै: सार्द्ध द्रपदस्य निवेशने

قال يودهيشثيرا: «ليحفظ كاهنُ أسرتنا هذا نيرانَ الأَغْنِيهوترا المقدّسة. ومع الطهاة ومشرف المطبخ، فليقِم في دار الملك دروبادا، وهناك يصون دوام نيران طقوسنا دون انقطاع.»

Verse 3

इस प्रकार श्रीमह्य भारत विराटपर्वके अन्तर्गत पाण्डवप्रवेशपर्वमें यगुधिछ्ठिर आदिकी परस्पर मन्त्रणाविषयक तीसरा अध्याय पूरा हुआ

قال يودهيشثيرا: «ليأخذ إندراسينا وسائر الخدم العربات وحدها، وليمضوا مسرعين إلى دْوَارَفَتِي—فهذه مشورتي بعد روية.» وقال فايشَمبايانا: وهكذا تشاوروا فيما بينهم، ووزّعوا الأعمال على كلٍّ على حدة، ثم استدعوا الكاهن دهاوميا؛ فخاطبهم بدوره بكلماتٍ من الإرشاد.

Verse 4

इमाश्ष नारयों द्रौपद्या: सर्वाश्ष॒ परिचारिका: । पाञ्जालानेव गच्छन्तु सूदपौरोगवै: सह,और ये जो द्रौपदीकी सेवा करनेवाली स्त्रियाँ हैं, वे सब रसोइयों और पाकशालाध्यक्षके साथ पांचालदेशको ही चली जायाँ इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि पाण्डवप्रवेशपर्वणि धौम्योपदेशे चतुर्थो5ध्याय: ।।

قال يودهيشثيرا: «لتعد جميع نساء دروبادي—وصيفاتها وخادماتها—إلى أرض البانچالا، مع الطهاة ومشرفي المطبخ.»

Verse 5

सर्वैरपि च वक्तव्यं न प्राज्ञायन्त पाण्डवा: । गता ह्[स्मानपाहाय सर्वे द्वैतववनादिति,वहाँ सब लोग यही कहें--“हमें पाण्डवोंका कुछ भी पता नहीं है। वे सब द्वैतवनसे ही हमें छोड़कर न जाने कहाँ चले गये”

قال يودهِشْثيرا: «عليكم جميعًا أن تقولوا هذا: ‘لا نعلم شيئًا عن أبناء باندو. لقد تركونا جميعًا ورحلوا من غابة دْفَيتَفَنَ—ولا أحد يدري إلى أين مضوا.’»

Verse 6

वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! इस प्रकार आपसमें एक-दूसरेकी सलाह लेकर और अपने पृथक्‌-पृथक्‌ कर्म बतलाकर पाण्डवोंने पुरोहित धौम्यकी भी सम्मति ली। तब पुरोहित धौम्यने उन्हें इस प्रकार सलाह दी

قال فايشَمبايانا: «يا جاناميچايا! لما تشاور أبناء باندو فيما بينهم على هذا النحو وبيّن كلٌّ منهم واجبه الخاص، التمسوا أيضًا موافقة كاهنهم العائلي، دهاوميا، فنالوها. ثم أسداهم الكاهن دهاوميا النصح على الوجه الآتي.»

Verse 7

धौग्य उवाच विहितं पाण्डवा: सर्व ब्राह्मणेषु सुहृत्सु च । याने प्रहरणे चैव तथैवाग्निषु भारत

قال دهاوميا: «يا أبناء باندو، لقد أحطتم علمًا وأحسنتم ترتيب كل ما أوجبته الشاسترا في حقّ البراهمة والأصدقاء المخلصين، وكذلك في شؤون المراكب والأسلحة، ومثل ذلك النيران المقدّسة، يا بهاراتا.»

Verse 8

त्वया रक्षा विधातव्या कृष्णाया: फाल्गुनेन च | विदितं वो यथा सर्व लोकवृत्तमिदं तव

قال دهاوميا: «عليك أن تتخذ الحماية لكِرِشْنَا (دراوبدي)، وعلى فالغونا (أرجونا) كذلك. وأنتم على علمٍ بطرائق الناس في الدنيا وما جرت به عادتهم في السلوك. فكونوا على حذر، ودبّروا أمنها بما يليق.»

Verse 9

विदिते चापि वक्तव्यं सुहृद्धिरनुरागत: । एष धर्मश्ष कामश्न अर्थशक्षैव सनातन:

وإن كانت المسألة معلومةً من قبل، فإن الأصدقاء الناصحين، بدافع المودّة، ينبغي لهم أن ينطقوا بما فيه نفع. فهذا هو طريق الدharma الأزلي؛ وبه تُنال كذلك kāma (الرغبة المشروعة) وartha (الرفاه المادي).

Verse 10

अतो5हमपि वक्ष्यामि हेतुमत्र निबोधत । हन्तेमां राजवसतिं राजपुत्रा ब्रवीम्पहम्‌

قال دهوميا: «لذلك سأبيّن أنا أيضًا السبب—فأصغوا هنا بإمعان. أيها الأمراء، سأخبركم عن الإقامة في دار الملك: كيف ينبغي للمرء أن يسلك وهو مقيم في البيت الملوكي. فإذا عملتم بذلك، فمع أنكم تسكنون بين أهل البيت الملكي، ستقدرون على تجاوز العيوب الكثيرة التي تنشأ هناك. فإن الإقامة في القصر عسيرةٌ غاية العسر حتى على الرجل البصير.»

Verse 11

यथा राजतकुले प्राप्य सर्वान्‌ दोषांस्तरिष्यथ । दुर्वसं चैव कौरव्य जानता राजवेश्मनि

قال دهوميا: «سأشرح كيف، بعد دخولكم بيتًا ملكيًا، تستطيعون مع ذلك أن تتجاوزوا كل العيوب التي تنشأ فيه. يا كاورافيا، إن السكنى في قصر الملك شديدة العسر حتى على الرجل المتبصّر؛ فاستمعوا بإمعان إلى النصح الرشيد الذي أضعه الآن في شأن حسن السلوك في دار الملك.»

Verse 12

अमानितैरमननितैर्वा अज्ञातै: परिवत्सरम्‌ ततश्नतुर्दशे वर्षे चरिष्पथ यथासुखम्‌

قال دهوميا: «سواء لقيتم هوانًا أم نلتم إكرامًا، فاصبروا على ذلك كله، وامكثوا سنةً كاملة في خفاءٍ لا يعرفكم فيه أحد. ثم إذا حلّت السنة الرابعة عشرة، استطعتم أن تسيروا أحرارًا مسرورين وفق مشيئتكم.»

Verse 13

दृष्टद्वारो लभेद्‌ द्रष्टं राजस्वेषु न विश्वसेत्‌ । तदेवासनमन्विच्छेद्‌ यत्र नाभिपतेत्‌ पर:

قال دهوميا: «من أراد لقاء الملك فليتقدّم أولًا إلى بوّاب القصر وليستأذن ليُؤذن له بالمثول. ولا ينبغي أن يُلقى الثقة الكاملة في الملوك. ولْيختر المرء لنفسه مقعدًا لا يُتوقَّع أن يطالب به أحدٌ أو يجلس عليه.»

Verse 14

यो न यान॑ न पर्यड्कं न पीठं न गजं रथम्‌ | आरोहेत्‌ सम्मतो$5स्मीति स राजवसतिं वसेत्‌

قال دهوميا: «من ظنّ في نفسه: “أنا من خاصّة الملك”، ثم لم يركب قطّ مركوب الملك، ولا يصعد إلى سريره، ولا يجلس على مقعده، ولا يعتلي فيله أو عربته—فهو وحده يستطيع أن يقيم في دار الملك إقامةً آمنةً مستقيمة.»

Verse 15

यत्र यत्रैनमासीनं शड्केरन्‌ दुष्टचारिण: । न तत्रोपविशेद्‌ यो वै स राजवसतिं वसेत्‌,जिन-जिन स्थानोंपर बैठनेसे दुराचारी मनुष्य संदेह करते हों, वहाँ-वहाँ जो कभी नहीं बैठता, वही राजभवनमें रह सकता है

قال دهاوميا: «حيثما كان الأشرارُ يَرتابون إذا رأوه جالسًا، فلا يجلس هناك أبدًا. إنما من يتجنّب المواضع التي تُورِث الشبهة هو وحده القادر على الإقامة آمنًا في دارٍ ملكية».

Verse 16

न चानुशिष्याद्‌ राजानमपृच्छन्तं कदाचन । तृष्णी त्वेममुपासीत काले समभिपूजयेत्‌,बिना पूछे राजाको कभी कर्तव्यका उपदेश न दे। मौनभावसे ही उसकी सेवा करे और उपयुक्त अवसरपर राजाकी प्रशंसा भी करे

قال دهاوميا: «لا ينبغي لأحدٍ أن يُسدي النصح للملك ما لم يسأل. بل ليلازمه في صمتٍ مهيب، فإذا جاء أوانُه قدّم له ما يستحقه من الإكرام والثناء».

Verse 17

असूयन्ति हि राजानो जनाननृतवादिन: । तथैव चावमन्यन्ते मन्त्रिणं वादिनं मृषा,झूठ बोलनेवाले मनुष्योंके प्रति राजालोग दोषदृष्टि कर लेते हैं। इसी प्रकार वे मिथ्यावादी मन्त्रीका भी अपमान करते हैं

فإن الملوك ينظرون بعين الشكّ والتتبّع للعيب إلى من ينطق بالكذب؛ وكذلك يزدَرون المستشار الذي يقول زورًا. وفي هذا البيت تحذيرٌ أخلاقيٌّ وسياسيٌّ: فالصدقُ ضرورةٌ لا للعامة فحسب، بل للوزراء على وجهٍ أخصّ، إذ إن مصداقيتهم هي التي تُقيم ثقةَ الملك وتعضد حسنَ الحكم.

Verse 18

नैषां दारेषु कुर्वीत मैत्रीं प्राज्ञ. कदाचन । अन्तःपुरचरा ये च द्वेष्टि यानहिताश्न ये

لا ينبغي للحكيم أن يعقد صداقةً حميمةً مع زوجاتِ الآخرين قطّ. وأما الذين يختلفون إلى الحجرات الداخلية، والذين بدافع العداوة يبتغون أذى الغير، فينبغي الحذر منهم.

Verse 19

बुद्धिमान्‌ पुरुषको चाहिये कि वह राजाओंकी रानियोंसे मेल-जोल न करे और जो रनिवासमें आते-जाते हों, राजा जिनसे द्वेष रखते हों तथा जो लोग राजाका अहित चाहनेवाले हों, उनसे भी मैत्री स्थापित न करे ।।

قال دهاوميا: «على الرجل الحصيف أن يجتنب المخالطة القريبة لملكات الملوك. ولا يعقد صداقةً مع من يختلفون إلى الحجرات الداخلية، ولا مع من يبغضهم الملك، ولا مع من يتمنّون للملك سوءًا. وحتى أصغر الأعمال لا تُقضى إلا بعد إعلام الملك. ومن يسلك هذا المسلك في البلاط لا يلحقه ضررٌ في موضعٍ من المواضع».

Verse 20

गच्छन्नपि परां भूमिमपृष्टो हनियोजित: । जात्यन्ध इव मन्येत मर्यादामनुचिन्तयन्‌

ولو أنه حين يصل يجد مقعدَ شرفٍ معدًّا له، فما دام الملك لم يسأله ولم يأمره بالجلوس، فعليه—مراعيًا حرمة مجلس البلاط—أن يعدّ نفسه كالأعمى منذ الولادة، فيتصرف كأنه لا يرى ذلك المقعد أصلًا، ويظل قائمًا ينتظر الإذن الملكي. وفي هذا تعليمٌ للتواضع المنضبط والالتزام الصارم بآداب الملوك بوصفه من الدharma.

Verse 21

नहि पुत्र न नप्तारं न भ्रातरमरिंदमा: । समतिक्रान्तमर्यादं पूजयन्ति नराधिपा:,क्योंकि शत्रुविजयी राजालोग मर्यादाका उल्लंघन करनेवाले अपने पुत्र, नाती-पोते और भाईका भी आदर नहीं करते

يا قاهرَ الأعداء، إن الملوك لا يكرمون حتى ابنهم أو حفيدهم أو أخاهم إذا تجاوز حدود السلوك القويم. فاعتبارُ الملك محكومٌ بالدharma وبنظام المملكة العام، لا بمجرد رابطة الدم.

Verse 22

यत्नाच्चोपचरेदेनमग्निवद्‌ देववत्‌ त्विह । अनुतेनोपचीर्णो हि हन्यादेव न संशय:

قال دهاوميا: «في هذا العالم ينبغي أن تُخدمَ الملكُ بيقظةٍ وحذر: لا تقترب منه كثيرًا، إذ هو مُحرقٌ كالنار؛ ولا تُعامله باستخفافٍ قط، إذ هو كالإله قادرٌ على الكفّ والإنعام. فداوم على خدمته باجتهاد. ولا ريب: من يخدم ملكًا بعنايةٍ كاذبةٍ وملاطفةٍ مخادعة، فسيُقتل يومًا لا محالة بيده.»

Verse 23

यद्‌ यद्‌ भर्तानुयुञ्जीत तत्‌ तदेवानुवर्तयेत्‌ प्रमादमवलेपं च कोप॑ च परिवर्जयेत्‌,राजा जिस-जिस कार्यके लिये आज्ञा दे, उसीका पालन करे। लापरवाही, घमंड और क्रोधको सर्वथा त्याग दे

قال دهاوميا: «أيَّ عملٍ يكلّف به السيد، فذلك وحده ينبغي أن يُؤدَّى بأمانة. وليُجتنب اجتنابًا تامًّا الإهمالُ والكبرُ والغضب.»

Verse 24

समर्थनासु सर्वासु हितं च प्रियमेव च । संवर्णयेत्‌ तदेवास्य प्रियादपि हितं॑ भवेत्‌

في كل موطنٍ يُفصل فيه بين ما ينبغي فعله وما لا ينبغي، فليقل المرء كلامًا يجمع بين النفع وحسن السمع. فإن تعذّر الجمع بينهما، فليترك اللطيفَ من القول وليقل النافعَ وحده—ولا يقل قط كلامًا مُحبَّبًا يخالف المصلحة.

Verse 25

अनुकूलो भवेच्चास्य सर्वार्थेषु कथासु च । अप्रियं चाहित॑ यत्‌ स्थात्‌ तदस्मै नानुवर्णयेत्‌

فليكن مُلائِمًا للملك في كل شأن، وفي الحديث أيضًا. وأمّا ما قد يكون مُؤذيًا ومُضرًّا ومكروهًا لديه، فلا يروِه له ولا يُكثر من ذكره بين يديه.

Verse 26

नाहमस्य प्रियो5स्मीति मत्वा सेवेत पण्डित: । अप्रमत्तश्न सततं हित॑ कुर्यात्‌ प्रियं च यत्‌

على الحكيم أن يخدم وهو يعتقد: «لستُ بالضرورة من خاصّة هذا الملك ومحبّيه». فيبقى يقِظًا على الدوام غير مُهمِل، ولا يفعل إلا ما فيه نفع للحاكم—وما يوافق هواه أيضًا.

Verse 27

नास्यानिष्टानि सेवेत नाहितै: सह संवदेत्‌ । स्वस्थानान्न विकम्पेत स राजवसतिं वसेत्‌

قال دهاوميا: «لا ينغمسنّ في شيءٍ يكرهه الملك، ولا يُحادثنّ من كان عدوًّا أو سيّئ النيّة. ولا يَحِدْ عن موضعه وواجبه المعيَّن. إنما من يسلك هذا المسلك المنضبط يستطيع أن يقيم آمنًا في دار الملك.»

Verse 28

दक्षिणं वाथ वाम॑ वा पाश्वमासीत पण्डित: । रक्षिणां ह्यात्तशस्त्राणां स्थानं पश्चात्‌ विधीयते

قال دهاوميا: «على الحكيم أن يجلس عن يمين الملك أو عن يساره؛ لأن الموضع خلف الملك مُخصَّص للحرس المسلّحين.»

Verse 29

नित्यं हि प्रतिषिद्ध तु पुरस्तादासनं महत्‌ | न च संदर्शने किज्चित्‌ प्रवृत्तमपि संजयेत्‌

قال دهاوميا: «في حضرة الملك يُحرَّم دائمًا اتخاذ مقعدٍ عالٍ. وإذا جرى أمام عينيه توزيعٌ ما—كالمكافآت أو الأجور—فلا يتقدّمنّ أحدٌ ليأخذ شيئًا من تلقاء نفسه ما لم يُدعَ.»

Verse 30

अपि होतद्‌ दरिद्राणां व्यलीकस्थानमुत्तमम्‌ । न मृषाभिहितं राज्ञां मनुष्येषु प्रकाशयेत्‌

قال دهوغيا: «حتى بين الفقراء تُعَدّ الوقاحةُ المتبجّحةُ أبغضَ ما يكون؛ فكيف إذا تعلّق الأمرُ بالملوك! لذلك لا ينبغي للمرء أن يفضح أمام الناس أيَّ قولٍ كاذب يُنسب إلى ملك».

Verse 31

असूयन्ति हि राजानो नराननृतवादिन: । तथैव चावमन्यन्ते नरान्‌ पण्डितमानिन:

إنّ الملوكَ حقًّا يضمرون السخطَ على من ينطق بالكذب. وكذلك يزدَرون من لا يفعل سوى أن يتوهّم لنفسه العلم. وتُفهم من هذه المشورة دلالةٌ على أنّه في مجلس الملك ينبغي اجتنابُ الكذب كما ينبغي اجتنابُ التظاهر المتكلّف بالحكمة، إذ إنّ كليهما يستجلب سخطَ الملك ويُوهِن مكانة المرء.

Verse 32

शूरोअस्मीति न दृप्तः स्याद्‌ बुद्धिमानिति वा पुनः । प्रियमेवाचरन्‌ राज्ञ: प्रियो भवति भोगवान्‌

لا ينبغي للمرء أن يزهو قائلاً: «أنا بطل»، أو «أنا حكيم». إنما من يداوم على ما يرضي الملك وحده يصير محبوبًا لديه، وينعم بالثراء والنعمة.

Verse 33

ऐश्वर्य प्राप्य दुष्प्रापं प्रियं प्राप्प च राजतः । अप्रमत्तो भवेद्‌ राज्ञ: प्रियेषु च हितेषु च

إذا نال المرءُ سلطانًا عسيرَ المنال، ونال كذلك حظوةَ الملك، فعليه أن يظلّ يقظًا ضابطًا لنفسه، منكبًّا على الأعمال التي تُرضي الملك وتعود عليه بالنفع. وتؤكد هذه التعاليم أن الثراء النادر والقرب من الحضرة الملكية يقتضيان سلوكًا حذرًا وخدمةً مخلصةً وعنايةً بما يحقق مصلحة الحاكم حقًّا، لا مجرد الانغماس في اللذة.

Verse 34

यस्य कोपो महाबाध: प्रसादश्ष महाफल: । कस्तस्य मनसापीच्छेदनर्थ प्राज्ञसम्मत:

«من كان غضبُه يجلبُ بلاءً عظيمًا، ورضاه يمنحُ جزاءً جليلًا—فأيُّ حكيمٍ، ولو في خاطرِه، يرغبُ أن يُلحق الأذى بمثل هذا الملك؟»

Verse 35

नचोष्ठी न भुजौ जानू न च वाक्यं समाक्षिपेत्‌ । सदा वातं च वाचं च छीवन॑ चाचरेच्छनै:

قال دهوميا: «في حضرة الملك لا ينبغي للمرء أن يضطرب أو يتحرّك عبثًا؛ فلا يُحرّك شفتيه ولا ذراعيه ولا ركبتيه بلا موجب. ولا يطلق الكلام على عجل ولا يخوض في اللغو. لتكن الكلمة موزونة رفيقة، وحتى البصق وإخراج الريح فليكن على خفاءٍ وهدوءٍ وبأدب، دون أن يشعر به الآخرون.»

Verse 36

हास्यवस्तुषु चान्यस्य वर्तमानेषु केषुचित्‌ । नातिगाढढं प्रहष्येत न चाप्युन्मत्तवद्धसेत्‌

قال دهوميا: «إذا عرض أمرٌ مضحك يتعلّق بغيرك، فلا تُبدِ فرحًا مفرطًا، ولا تضحك ضحكًا عاليًا كالمجنون. ولكن لا تبقَ أيضًا جامدًا خامدًا كأنك بلا إحساس بحجة ضبط النفس الشديد. فإذا سرّت النفس، فليظهر ذلك في ابتسامة لطيفة مكبوحة؛ فبمثل هذا الاتزان ينال المرء الوقار والاحترام.»

Verse 37

न चातिधैर्येण चरेद्‌ गुरुतां हि व्रजेत्‌ ततः । स्मितं तु मृदुपूर्वेण दर्शयेत प्रसादजम्‌

قال دهوميا: «لا يسلك المرء بسلوكٍ شديد القسوة ولا بضبط نفسٍ متصلّب مفرط، فإن ذلك يجرّه إلى فقدان الوقار ويجعله ثقيلًا عسير القرب. بل إذا سُرّ القلب فليُبدِ ابتسامةً لطيفةً مكبوحةً نابعةً من صفاء الداخل—من غير انفجارٍ في الضحك على ما يضحك من شأن غيره، ومن غير تصرّفٍ كالأحمق.»

Verse 38

लाभे न हर्षयेद्‌ यस्तु न व्यथेद्‌ योडवमानित: । असम्मूढश्न यो नित्यं स राजवसतिं वसेत्‌

قال دهوميا: «من لا يطغى فرحًا عند المكسب، ولا يضطرب عند الإهانة، ويظلّ دائمًا غير مُلتبسٍ ذا تمييز—فذلك وحده يستطيع أن يقيم في دار الملك إقامةً هانئة.»

Verse 39

राजानं राजपुत्रं वा संवर्णयति य: सदा | अमात्य: पण्डितो भूत्वा स चिरं तिष्ठते प्रिय:

قال دهوميا: «الوزير الحكيم الذي يداوم على الثناء على الملك—أو على ابن الملك—يُعدّ عاقلًا ذا رأي؛ وببقائه محبوبًا لدى الحاكم يستطيع أن يثبت طويلًا ويحفظ منصبه لمدّة مديدة.»

Verse 40

प्रगृहीतश्च॒ यो5मात्यो निगृहीतस्त्वकारणै: । न निर्वदति राजानं लभते सम्पदं पुन:

قال دهوميا: حتى لو كان وزيرٌ قد حظي يومًا برضا الملك ثم عوقب بعد ذلك بغير سبب، فإنّه إن لم يقدح في الملك ولم يسبّه عاد إليه رخاؤه من جديد. والحكيم الذي يعتاش في كنف الملك أو يقيم في مملكته ينبغي له أن يذكر محاسن الملك وحدها، حضورًا وغيابًا.

Verse 41

प्रत्यक्ष च परोक्षं च गुणवादी विचक्षण: । उपजीवी भवेद्‌ राज्ञो विषये योडपि वा भवेत्‌

قال دهوميا: سواء أكان المرء بين يدي الملك أم من وراء ظهره، فعلى اللبيب أن لا يذكر إلا محاسن الملك. وحتى من لا يعدو أن يقتات تحت حماية الملك أو يقيم في أرض مملكته، ينبغي له أن يحفظ هذا الوفاء في كلامه. والعبرة الأخلاقية بيّنة: الشكر وكفّ اللسان واجبان على من يعتمد على غيره؛ فلا يُجازى الإحسان الملكي باللوم، ولو نزل بالمرء عقابٌ غير مستحق، فإن الثبات على الولاء قد يعيد إليه منزلته الأولى.

Verse 42

अमात्यो हि बलाद्‌ भोक्तुं राजानं प्रार्थयेत यः । न स तिष्ठेच्चिरं स्थानं गच्छेच्च प्राणसंशयम्‌

قال دهوميا: «إن الوزير الذي يبتغي أن “يتمتع” بالسلطان بإكراه الملك وإخضاعه بالقوة، فلن يثبت طويلًا في منصبه؛ بل سرعان ما يقع في خطرٍ يتهدد حياته نفسها».

Verse 43

श्रेयः सदा55त्मनो दृष्ट्वा परं राज्ञा न संवदेत्‌ विशेषयेच्च राजानं योग्यभूमिषु सर्वदा

إذ يرى المرء أن صلاحه ومصلحته مقدَّمان، فلا ينبغي له أن يلازم التماس القرب الخاص من الملك طلبًا لمنفعةٍ شخصية، ولا أن يكثر من الحديث المألوف الذي لا حاجة إليه. بل عليه أن يختار الموضع والوقت اللائقين، ثم يقرّ بفضل الملك ويُظهر تميّزه على الوجه السديد، لتبقى المشورة على نهج القويم وتظل الصلة بالعرش مصونة الكرامة.

Verse 44

अम्लानोबलवाउछूरश्छायेवानुगत: सदा । सत्यवादी मृदुर्दान्त: स राजवसतिं वसेत्‌

قال دهوميا: «إنما يثبت في البلاط حقًّا من لا يعتريه فتور، قويٌّ ماضٍ في العزم—يتبع الملك على الدوام كظلّه، صادقُ اللسان، ليّنُ السلوك، ضابطٌ لنفسه—فذلك وحده من يقدر على المقام والاحتمال في دار الملك».

Verse 45

अन्यस्मिन्‌ प्रेष्यमाणे तु पुरस्ताद्‌ यः समुत्पतेत्‌ । अहं कि करवाणीति स राजवसतिं वसेत्‌

قال دهاوميا: «إذا أُرسِل غيرُك في مهمة، فمَن ينهضُ في الحال، ويتقدّمُ أولًا، ويسأل: “بماذا تأمرني؟”—فذاك هو الجديرُ بالإقامة في دار الملك».

Verse 46

आन्तरे चैव बाहों च राज्ञा यश्चाथ सर्वदा । आदिट्टो नैव कम्पेत स राजवसतिं वसेत्‌

قال دهاوميا: «لا يقيم في بيت الملك إلا من إذا أمره الملك بمهام الداخل (حراسة المال وحرَم النساء) ومهام الخارج (قهر الأعداء وإحراز الظفر)، لم يتزلزل قط—لا شكًّا ولا خوفًا».

Verse 47

यो वै गृहेभ्य: प्रवसन्‌ प्रियाणां नानुसंस्मरेत्‌ । दुःखेन सुखमन्विच्छेत्‌ स राजवसतिं वसेत्‌

قال دهاوميا: «مَن عاش بعيدًا عن داره فلا يظلّ يستغرق في تذكّر أحبّته وملاذّه المشتهاة، ويطلبُ خيرَ الغد باحتمال الشدائد—فذاك وحده يصلح للثبات في بلاط الملك».

Verse 48

समवेषं न कुर्वीत नोच्चै: संनिहितो वसेत्‌ । न मन्त्र बहुधा कुयदिवं राज्ञ: प्रियो भवेत्‌

قال دهاوميا: «لا تُشابه الملك في لباسه وهيئته، ولا تُلازمه ملازمةً شديدة، ولا تجلس على مقعدٍ عالٍ بين يديه، ولا تُفشِ ما أفضى به إليك من مشورةٍ سرّية. فبمثل هذا التوقير والكتمان يصير المرء محبوبًا لدى الحاكم».

Verse 49

न कर्मणि नियुक्त: सन्‌ धनं किज्चिदपि स्पृशेत्‌ । प्राप्रोति हि हरन्‌ द्रव्यं बन्धनं यदि वा वधम्‌

قال دهاوميا: «مَن وُكِّل بعملٍ فلا يمسّ مالًا شيئًا، ولو يسيرًا؛ فإن من يختلس المتاع على هذا النحو ينتهي به الأمر يومًا إلى القيد أو القتل».

Verse 50

यान॑ वस्त्रमलड्कारं यच्चान्यत्‌ सम्प्रयच्छति । तदेव धारयेन्नित्यमेवं प्रियतरो भवेत्‌

أيًّا كانت الراحلة أو الثياب أو الحُليّ أو سائر ما يمنحه الملك، فعلى المرء أن يلازم استعمال تلك العطية بعينها دائمًا. فبثبات القبول وإظهار الانتفاع بفضل الملك، يغدو المرء أحبَّ إلى الملك—وهذه سنّة الوفاء والشكر وحسن السلوك في بلاط الملوك.

Verse 51

एवं संयम्य चित्तानि यत्नतः पाण्डुनन्दना: । संवत्सरमिमं तात तथाशीला बुभूषत । अथ स्वविषयं प्राप्प यथाकामं करिष्यथ

قال دهاوميا: «يا أبناء پاندو، اكبحوا عقولكم بجهدٍ يقِظ. يا بُنيّ، اقضوا هذه السنة على ذات الانضباط، محافظين على السلوك المرسوم. ثم إذا استعدتم مُلككم، جاز لكم أن تعملوا كما تشاؤون. فلهذا، يا يودهيشثيرا، ليتحمّل الباندافا هذه السنة بضبط النفس، طامحين إلى استرجاع السيادة.»

Verse 52

युधिछिर उवाच अनुशिष्टा: सम भद्रं ते नैतद्‌ वक्तास्ति कश्नन । कुन्तीमृते मातरं नो विदुरं वा महामतिम्‌

قال يودهيشثيرا: «أيها البراهمن، ليكن لك الخير. لقد أحسنت تعليمنا غاية الإحسان. فما عدا أمّنا كونتي وڤيدورا العظيم الرأي، لا أحد غيرهما يستطيع أن يقول لنا مثل هذا القول.»

Verse 53

यदेवानन्तरं कार्य तद्‌ भवान्‌ कर्तुमर्हति । तारणायास्य दुःखस्य प्रस्थानाय जयाय च,अब हमें इस दुःखसागरसे पार होने, यहाँसे प्रस्थान करने और विजय पानेके लिये जो कर्तव्य आवश्यक हो, उसे आप पूर्ण करें

«وأمّا ما يجب فعله حالًا بعد هذا، فأنت وحدك أهلٌ لإنجازه—لكي نعبر هذا الشقاء، ونغادر من هنا، ونبلغ الظفر.»

Verse 54

वैशम्पायन उवाच एवमुक्तस्ततो राज्ञा धौम्यो5थ द्विजसत्तम: | अकरोद्‌ विधिवत सर्व प्रस्थाने यद्‌ विधीयते

قال ڤايشَمبايانا: «فلما قال الملك (يودهيشثيرا) ذلك، قام دهاوميا—وهو أرفعُ البراهمة—فأتمّ على وجهه، وفقًا للشرائع والطقوس، كلَّ ما يُؤدَّى عند الاستعداد للرحيل، وأجرى ذلك كله كما ينبغي.»

Verse 55

तेषां समिध्य तानग्नीन्‌ मन्त्रवच्च जुहाव सः । समृद्धिवृद्धिलाभाय पृथिवीविजयाय च

قال فايشَمبايانا: بعدما أوقد لهم تلك النيران المقدّسة، قدّم القرابين بتلاوة منترات الفيدا، يلتمس لهم الرخاء والازدياد، ونيل السلطان الحقّ، والظفر على وجه الأرض. وفي هذا الفعل يتجلّى أن النجاح ليس ثمرة القوّة المجردة، بل حصيلة طقسٍ منضبط، وطموحٍ مشروع، ومواءمةٍ خاشعةٍ مع النظام المقدّس.

Verse 56

अग्नीन्‌ प्रदक्षिणीकृत्य ब्राह्मणांश्न तपोधनान्‌ । याज्ञसेनीं पुरस्कृत्य षडेवाथ प्रवव्रजु:

قال فايشَمبايانا: بعدما طافوا بخشوع حول النيران المقدّسة وحول البراهمة الزهّاد الأغنياء بالتقشّف، وجعلوا ياجناسيني (دراوبدي) في المقدّمة، انطلقوا من هناك. ولم ينهض من مجلسه ويرحل معهم إلا ستة أشخاص، في فعلٍ موسومٍ بتوقير الطقس وبانضباط الكفّ عن الإفراط.

Verse 57

गतेषु तेषु वीरेषु धौम्यो5थ जपतां वर: । अग्निहोत्राण्युपादाय पाउ्चालानभ्यगच्छत

فلما مضى أولئك الأبطال، أخذ دهوْميا—وهو الأسبق بين أهل الجَپا (الترديد) وتلاوة القرابين—نيران الأَغْنِيهوترا المقدّسة، وسار إلى أرض البانچالا. وتُبرز الآية صونَ الطقوس الفيدية بعناية حتى في المنفى ومواطن الخطر السياسي: فالدَّرما تُحمَل إلى الأمام باستمراريةٍ منضبطة، لا تُترك عند الشدائد.

Verse 58

इन्द्रसेनादयश्वैव यथोक्ता: प्राप्प यादवान्‌ । रथानश्चांश्व॒ रक्षन्त: सुखमूषु: सुसंवृता:

قال فايشَمبايانا: إن إندراسينا وسائر الخدم، بعدما تلقّوا الأوامر كما سُبِق بيانُه، بلغوا إلى اليادافا. وهناك، وهم في حمايةٍ محكمة، أقاموا راضين، يحرسون العربات والخيول، مؤدّين الأمانة التي أُودِعت لديهم بوفاء.

Frequently Asked Questions

Maintaining integrity and safety while serving under concealment: behaving truthfully and respectfully without revealing identity, provoking suspicion, or creating courtly conflict.

In a royal household, minimize conspicuousness: speak only when appropriate, avoid overfamiliarity and sensitive spaces, follow orders promptly, and sustain composure so that service remains useful yet non-threatening.

No explicit phalaśruti is stated; the implied result is pragmatic—security, continuity of concealment, and successful completion of the incognito year enabling later restoration.

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