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Shloka 34

नलस्य बाहुकत्वेन ऋतुपर्णनगरप्रवेशः

Nala as Bāhuka enters Ṛtuparṇa’s city

पतिमन्वेषतीमेकां कृपणां शोककर्षिताम्‌ । आश्वासय मृगेन्द्रेह यदि दृष्टस्त्वया नल:,“मृगेन्द्र! मैं इस वनमें अकेली पतिकी खोजमें भटक रही हूँ तथा शोकसे पीड़ित एवं दीन हो रही हूँ। यदि आपने नलको यहाँ कहीं देखा हो तो उनका कुशल-समाचार बताकर मुझे आश्वासन दीजिये

يا سيّدَ الوحوش! إنني وحيدةٌ أفتّش عن زوجي، أهيم في هذا الغاب، بائسةً ينهشها الحزن. فإن كنتَ قد رأيتَ نالا في موضعٍ ما، فأخبرني بسلامته وواسِني.

बृहृदश्च उवाच