Mātali’s Arrival and Arjuna’s Ascent toward Amarāvatī (मातलिसंयुक्तरथागमनम् तथा इन्द्रलोकगमनारम्भः)
स्मयन्निव गुडाकेशं प्रेक्षमाण: सहस्रदूक् । हर्षेणोत्फुल्लनयनो न चातृप्यत वृत्रहा,सहसख््र नयनोंसे सुशोभित वृत्रसूदन इन्द्र निद्राविजयी अर्जुनको मुसकराते हुए-से देख रहे थे। उस समय इन्द्रकी आँखें हर्षसे खिल उठी थीं। वे उन्हें देखनेसे तृप्त नहीं होते थे
وكان إندرا قاتلَ فِرِترا، ذو الألف عين، ينظر إلى غوداكيشا كأنما يبتسم. وقد تفتّحت عيناه فرحًا، ولم يكن يشبع من النظر إليه.
वैशम्पायन उवाच