Yudhiṣṭhira’s Reproof and Vow-Logic: On Dice-Deception, Exile Terms, and the Governance of Anger
Adhyāya 35
निमेषादपि कौन्तेय यस्यायुरपचीयते । सूच्येवाञ्जनचूर्णस्य किमिति प्रतिपालयेत्,किंतु कुन्तीकुमार! सलाईसे थोड़ा-थोड़ा करके उठाये जानेवाले अंजनचूर्ण (सुरमे)-की भाँति एक-एक निमेषमें जिसकी आयु क्षीण हो रही है, वह क्षणभंगुर मानव समयकी प्रतीक्षा क्या कर सकता है?
يا ابنَ كونتي، إن عمرَ المرء ينقص حتى في لمحةٍ من طرف—كما يُلتقط مسحوقُ الكُحل بإبرةٍ شيئًا فشيئًا. فكيف لإنسانٍ خاطفِ الزوال أن ينتظر الزمان؟
भीमसेन उवाच