अध्याय ३० — क्रोधदोषाः क्षमाप्रशंसा च
Defects of Anger and the Praise of Forbearance
यदिदं वैश्वदेवं ते शान्तये क्रियते गृहे । तद् दत्त्वातिथिभूते भ्यो राजज्छिषप्टेन जीवसि,राजन! आपके द्वारा शान्तिके लिये जो घरमें यह वैश्वदेव कर्म किया जाता है, उसमें अतिथियों और प्राणियोंके लिये अन्न देकर आप अवशिष्ट अन्नके द्वारा जीवन-निर्वाह करते हैं
أيها الملك! إن شعيرة «فايشفاديفا» التي تُقام في دارك طلبًا للسكينة—تُقدِّم فيها الطعام أولًا للضيوف ولسائر الكائنات الحيّة، ثم تعيش بما يتبقّى من الطعام.
युधिछिर उवाच