Kṣānti–Tejas Viveka: Prahlāda’s Instruction to Bali
Draupadī’s Application
यो हि संहरते क्रोधं भवस्तस्य सुशोभने । यः पुन: पुरुष: क्रोधं नित्यं न सहते शुभे । तस्याभावाय भवति क्रोध: परमदारुण:,सुशोभने! जो क्रोधको रोक लेता है, उसकी उन्नति होती है और जो मनुष्य क्रोधके वेगको कभी सहन नहीं कर पाता, उसके लिये वह परम भयंकर क्रोध विनाशकारी बन जाता है
يا ذاتَ الحُسن، من كبح غضبَه نال النماء والرفعة؛ أمّا من لا يطيق اندفاع الغضب أبدًا، فإن غضبًا بالغَ الفظاعة يصير له هلاكًا مُدمّرًا.
युधिछिर उवाच