Sāvitrī’s Trirātra-Vrata and Departure with Satyavān (सावित्रीव्रतनिश्चयः सहगमनं च)
दक्षिणामिति काकुत्स्थो विदित्वास्य तदिल्,ितम् | संस्कारं लम्भयामास सखायं पूजयन् पितु:,उनके संकेतके अनुसार दक्षिण दिशा समझ लेनेके पश्चात् श्रीरामचन्द्रजीने पिताके मित्र होनेके नाते जटायुको आदर देते हुए उनका विधिपूर्वक अन्त्येष्टि-संस्कार किया
ففهم راما الكاكوتسثي من تلك الإشارة أنها جهةُ الجنوب، ثم أكرمَ جَتَايُو بوصفه صديقَ أبيه، وأقام له شعائرَ الجنازة وطقوسَ الإحراق الأخيرة على الوجه المأثور وفق السنن.
मार्कण्डेय उवाच