Sāvitrī’s Trirātra-Vrata and Departure with Satyavān (सावित्रीव्रतनिश्चयः सहगमनं च)
अचिरेणातिचक्राम खेचर: खे चरन्निव । ददर्शाथ पुरी रम्यां बहुद्वारां मनोरमाम्,आकाशचारी पक्षीकी भाँति आकाशगामी रावण थोड़े ही समयमें अपना मार्ग तय करके लंकाके निकट जा पहुँचा। उसने दूरसे ही अपनी रमणीय एवं मनोहर पुरीको देखा, जो अनेक दरवाजोंसे सुशोभित हो रही थी
ولم يلبث رافَنا، السائر في السماء كطائرٍ محلّق، أن قطع طريقه وبلغ قريبًا من لَنْكا. فرأى من بعيد مدينته البهيّة الآسرة، مزدانةً بأبوابٍ كثيرة.
मार्कण्डेय उवाच