अरण्यकपर्व — मार्कण्डेयकथिते रामविजयः, सीताशुद्धिः, अयोध्याप्रत्यागमनवर्णनम्
Rāma’s victory, Sītā’s vindication, and return to Ayodhyā as told by Mārkaṇḍeya
पितरं स समुत्सृज्य पितामहमुपस्थित: । तस्य कोपात् पिता राजन् ससर्जात्मानमात्मना,राजन! वैश्रवण अपने पिताको छोड़कर पितामहकी सेवामें रहने लगे। इससे उनपर क्रोध करके पिता पुलस्त्यने स्वयं अपने-आपको ही दूसरे रूपमें प्रकट कर लिया। पुलस्त्यके आधे शरीरसे जो दूसरा द्विज प्रकट हुआ, उसका नाम विश्रवा था। विश्रवा वैश्रवणसे बदला लेनेके लिये उनके ऊपर सदा कुपित रहा करते थे
pitaraṁ sa samutsṛjya pitāmaham upasthitaḥ | tasya kopāt pitā rājan sasarjātmānam ātmanā |
قال ماركانديّا: «إنَّ فايشرافَنا قد ترك أباه وتفرّغ لخدمة جدّه. فغضب أبوه—يا أيها الملك—وبقوّته هو أظهر من ذاته تجلّيًا آخر لنفسه».
मार्कण्डेय उवाच