द्रौपदी-शैब्यसंवादः — Draupadī’s Identification and Counsel on Hospitality
दुर्विनीता: श्रियं प्राप्य विद्यामैश्वर्यमेव च । तिष्ठन्ति न चिरं भद्रे यथाहं मदगर्वित:,उद्ण्ड मनुष्य लक्ष्मी, विद्या तथा ऐश्वर्यको पाकर भी दीर्घकालतक कल्याणमय पदपर प्रतिष्ठित नहीं रह पाते हैं। जैसे मैं मद और अहंकारमें चूर होकर अपनी प्रतिष्ठा खो बैठा हूँ
إنّ سيّئي التهذيب، وإن نالوا الشِّرِيّ (النعمة والثراء) والعلم والسلطان، لا يثبتون طويلاً في مقامٍ محمود؛ وهكذا أنا، وقد سَكِرتُ بالزهو والكبر، فأضعتُ منزلتي.
दुर्योधन उवाच