Karṇa’s Counsel on Śrī
Fortune) and the Proposed Display before the Exiled Pāṇḍavas (कर्णवचनम् / श्रीप्रदर्शन-प्रस्तावः
तस्यास्तप:प्रभावेण भर्तृशुश्रूषणेन च । षट्कृत्वस्तत् तु निक्षिप्तमग्ने रेत: कुरूत्तम,कुरुश्रेष्ठी उस देवीने सातों महात्मा सप्तर्षियोंकी पत्नियोंके समान रूप धारण करके अग्निदेवके साथ समागमकी इच्छा की थी; किंतु अरुन्धतीकी तपस्या तथा पति-शुश्रूषाके प्रभावसे वह उनका दिव्य रूप धारण न कर सकी, इसलिये छ: बार ही अग्निके वीर्यको वहाँ डालनेमें सफल हुई
tasyās tapaḥprabhāveṇa bhartṛśuśrūṣaṇena ca | ṣaṭkṛtvas tat tu nikṣiptam agne retaḥ kurūttama ||
قال ماركانديَّا: «بقوةِ تَبَسِها وبخدمتها المخلصةِ لزوجها، يا خيرَ الكورو، لم تُودَع بذرةُ أغني هناك إلا ستَّ مرات.»
मार्कण्डेय उवाच