कामीकवन-समागमः
Kāmyaka Forest Meeting: Kṛṣṇa’s Visit; Mārkaṇḍeya and Nārada Arrive
पाण्डवो भीमसेनो*हं धर्मराजादनन्तर: नागायुतसमप्राणस्त्वया नीत: कथं वशम्,फिर उन्होंने उस महान् सर्पसे कहा--“भुजंगप्रवर! आप स्वेच्छापूर्वक बताइये। आप कौन हैं? और मुझे पकड़कर क्या करेंगे? मैं धर्मराज युधिष्ठिरका छोटा भाई पाण्डुपुत्र भीमसेन हूँ। मुझमें दस हजार हाथियोंका बल है, फिर भी न जाने कैसे आपने मुझे अपने वशमें कर लिया? मेरे सामने सैकड़ों केसरी, सिंह, व्याप्र, महिष और गजराज आये, किंतु मैंने सबको युद्धमें मार गिराया। पन्नगश्रेष्ठ! राक्षस, पिशाच और महाबली नाग भी मेरी (इन) भुजाओंका वेग नहीं सह सकते थे। परंतु छूटनेके लिये मेरे उद्योग करनेपर भी आपने मुझे वशमें कर लिया, इसका क्या कारण है? क्या आपमें किसी विद्याका बल है अथवा आपको कोई न मिला है? नागराज! आज मेरी बुद्धिमें यही सिद्धान्त स्थिर हो रहा है कि का पराक्रम झूठा है। जैसा कि इस समय आपने मेरे इस महान् बलको कुण्ठित कर दिया है!
Vaiśampāyana uvāca: pāṇḍavo bhīmaseno ’haṃ dharmarājād anantaraḥ | nāgāyutasamaprāṇas tvayā nītaḥ kathaṃ vaśam ||
قال فايشَمبايانا: «أنا بهيماسينا، من الباندافا، الأخُ الأصغر الذي يلي دهرماراجا (يودهيشثيرا). قوتي تعدل قوةَ عشرةِ آلافِ فيل—فكيف أدخلتني تحت سلطانك؟ وبأي وسيلةٍ قهرتني؟»
वैशम्पायन उवाच
Physical might is not absolute; one may be overpowered by forces beyond brute strength (such as spiritual power, destiny, or hidden knowledge), prompting humility and inquiry rather than pride.
Bhīma, identifying himself as Yudhiṣṭhira’s next younger brother and famed for elephant-like strength, addresses the serpent who has subdued him, asking how such control was possible.