Bhīmasena’s Capture by the Serpent and Nahūṣa’s Self-Disclosure (भीमसेन-भुजङ्गग्रहणं नहुषोपाख्यानप्रस्तावः)
अस्त्राणि तानि दिव्यानि दर्शनायोपचक्रमे अथ प्रयोक्ष्यमाणेषु दिव्येष्वस्त्रेषु तेषु वै,महातेजस्वी अर्जुन पहले तो विधिपूर्वक स्नान करके शुद्ध हुए। फिर न्रिनेत्रधारी भगवान् शंकर और इन्द्रको नमस्कार करके उन्होंने वह अत्यन्त तेजस्वी दिव्य कवच धारण किया। तत्पश्चात् वे पृथ्वीरूपी रथपर आरूढ़ हो बड़ी शोभा पाने लगे। पर्वत ही उस रथका कूबर था, दोनों पैर ही पहिये थे और सुन्दर बाँसोंका वन ही त्रिवेणु (रथके अंगविशेष)-का काम देता था। तदनन्तर महाबाहु कुन्तीनन्दन अर्जुनने एक हाथमें गाण्डीव धनुष और दूसरेमें देवदत्त शंख ले लिया। इस प्रकार वीरोचित वेशसे सुशोभित हो उन्होंने क्रमश: उन दिव्यास्त्रोंको दिखाना आरम्भ किया। जिस समय उन दिव्यास्त्रोंका प्रयोग प्रारम्भ होने जा रहा था, उसी समय अर्जुनके पैरोंसे दबी हुई पृथ्वी वृक्षोंसहित काँपने लगी। नदियों और समुद्रोंमें उफान आ गया
astrāṇi tāni divyāni darśanāyopacakrame | atha prayokṣyamāṇeṣu divyeṣv astreṣu teṣu vai ||
قال فايشَمبايانا: عندئذٍ شرع أرجونا يُظهر تلك الأسلحةَ السماوية، جاعلًا إياها باديةً على الترتيب. ولمّا كان على وشك أن يباشر استعمال تلك المقاذيف الإلهية، ارتجّت الأرضُ نفسها—المضغوطة تحت قدميه—بما عليها من شجر، وهاجت الأنهارُ والمحيطُ اضطرابًا. ويؤكد هذا المقطع أنّ القوةَ الإلهية، وإن كانت في يد بطلٍ بارّ، لا تُتناوَل باستخفاف: فممارستها تُزلزل العالم، ولذلك تحتاج إلى كبحٍ للنفس، وطهارةٍ، وخشوع.
वैशम्पायन उवाच
The verse highlights the ethical weight of divine weaponry: such power is world-shaking and must be approached with discipline, purity, and restraint. Even a dharmic hero’s use of divyāstras carries cosmic consequences, implying that capability does not automatically justify deployment.
Arjuna begins to demonstrate the celestial weapons he has obtained. As he is about to actually employ them, nature reacts dramatically—earth trembles and waters surge—signaling the immense potency of the divyāstras and the gravity of their impending use.