Adhyāya 136: Yavakrī–Bharadvāja Saṃvāda and the Bāladhī–Dhanuṣākṣa Gāthā
Arrogance, Boons, and Nimitta
एवं लब्ध्वा वरान् बाला दर्पपूर्णास्तपस्विन: । क्षिप्रमेव विनश्यन्ति यथा न स्थात् तथा भवान्,इस प्रकार बालक तपस्वी वर पाकर घमण्डमें भर जाते हैं और (अपने दुर्व्यवहारोंके कारण) शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं। तुम्हारी भी यही अवस्था न हो (इसलिये सावधान किये देता हूँ)
«هكذا الفتيان من أهل الزهد إذا نالوا العطايا امتلأوا كِبرًا، ثم يهلكون سريعًا بسوء صنيعهم. فإياك أن تصير إلى مثل ذلك.»
भरद्वाज उवाच