
Sātyaki’s Call for Intervention and Yudhiṣṭhira’s Vow-Bound Restraint (सात्यकिवाक्यं—धर्मराजस्य धैर्यनिश्चयः)
Upa-parva: Tīrthayātrā-upaparva (Pilgrimage and Counsel in Exile)
Sātyaki addresses Balarāma (Rāma) and the Vṛṣṇi circle, arguing that lamentation is untimely and that those with protectors should not remain inactive. He questions why Kṛṣṇa (Janārdana), Balarāma, Pradyumna, Sāmba, Aniruddha, and other Vṛṣṇi heroes would allow the Pāṇḍavas—described as ‘lords of the three worlds’ in capability—to reside in the forest. He proposes immediate mobilization of the Daśārha force and depicts, in martial hyperbole, the capacity of Vāsudeva and the Yādava princes to neutralize the Kaurava leadership and their formations. Vāsudeva responds by accepting the spirit of Sātyaki’s statement yet clarifying that Yudhiṣṭhira will not seek an ‘unwon’ earth by mere force; he will not abandon svadharma for desire, fear, or greed, and the Pāṇḍava coalition remains formidable. Yudhiṣṭhira then affirms that what he must protect most is satya, not kingship; he recognizes mutual understanding with Kṛṣṇa, and states that victory will come when the proper time for valor arrives. He requests the Vṛṣṇi heroes to return, urges vigilance in dharma, and anticipates a future reunion. Vaiśaṃpāyana closes with their formal leave-taking and notes that the king continues visiting tīrthas, proceeding toward a well-watered sacred place and then to Payoṣṇī.
Chapter Arc: बलराम के शोक-विलाप के बीच सात्यकि उन्हें झकझोरते हैं—यह बैठकर रोने का समय नहीं; जो करना है, मिलकर अभी किया जाए। → सात्यकि ‘नाथ’ (सहायक/नेता) के बिना पड़ने वाली विपत्ति का तर्क रखते हैं और कृष्ण-पक्ष की सामर्थ्य का स्मरण कराते हैं—अर्जुनपुत्र अभिमन्यु, साम्ब आदि की रण-क्षमता का उदाहरण देकर बलराम के भीतर उठे संशय को काटते हैं। → कृष्ण की अपराजेयता का घोष—देवताओं सहित समस्त लोकों में कौन है जो कृष्ण के सामने युद्ध में अविषह्य हो? इसी निर्णायक वाक्य-प्रवाह से शोक का जड़त्व टूटता है और कर्तव्य-प्रवृत्ति जागती है। → वायुदेव कृष्ण के कथन की सत्यता की पुष्टि करते हैं—कुरुवृषभ (अर्जुन) अपने भुजबल से अजेय पृथ्वी को न चाहे, यह असंभव है; फिर कृष्ण को विदा कर धर्मराज युधिष्ठिर लोमश सहित भाइयों-बांधवों के साथ विदर्भ-प्रदेश की पुण्य सरिता ‘पयोष्णी’ की ओर तीर्थयात्रा में आगे बढ़ते हैं। → पयोष्णी-तीर्थ पर युधिष्ठिर का निवास और ब्राह्मणों द्वारा स्तुति—आगे इस तीर्थ के माहात्म्य/फल और अगले तीर्थ-क्रम का संकेत।
Verse 1
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशती र्थयात्राके प्रसंगमें बलरामवाक्यविषयक एक सौ उतन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ११९ ॥। अप ऋषाज [हुक है आम - इस प्रकारके वृक्षोंको प्रत्यक्ष देखना मृत्युसूचक माना गया है। विशर्त्याधिकशततमो< ध्याय: सात्यकिके शॉौर्यपूर्ण उद्बार तथा युधिष्ठिरद्वारा श्रीकृष्णके वचनोंका अनुमोदन एवं पाण्डवोंका पयोष्णी नदीके तटपर निवास सात्यकिरुवाच न राम काल: परिदेवनाय यदुत्तरं त्वत्र तदेव सर्वे समाचरामो हानतीतकालं युधिष्ठिरो यद्यपि नाह किंचित्
قال بالاديفا: «يا راما، ليس هذا أوان النواح. أيًّا يكن الوجهُ اللائق في هذا المقام، فلنمضِ جميعًا إلى إنفاذه. إن يودهيشثيرا، وإن لم يقل شيئًا، ليس ممن يدع اللحظةَ الصائبة تفلت دون فعل.»
Verse 2
सात्यकिने कहा--बलरामजी! यह समय बैठकर विलाप करनेका नहीं है। अब आगे जो कुछ करना है उसीको हम सब लोग मिलकर करें। यद्यपि महाराज युधिष्ठटिर हमसे कुछ नहीं कहते हैं तो भी हमें अब व्यर्थ समय न बिताकर कौरवोंको उचित उत्तर देना चाहिये ।।
قال بالاراما لساتياكي: «ليس هذا أوان الجلوس للنواح. ما ينبغي فعله بعدُ فلنتشاور فيه جميعًا ولنقم به. وإن كان الملك يودهيشثيرا لا يقول لنا شيئًا، فلا يجوز أن نُضيع الوقت سُدى؛ بل يجب أن نُسدي للكوروڤا جوابًا يليق بهم. إن أهل الدنيا ممن هم “ذوو سند”—أي من لهم أنصار كثيرون—لا يشرعون في الأعمال وحدهم؛ ففي شؤونهم يكون الحلفاءُ والمحبّون عُدّتهم، كما شارك شيبي وغيرُه، أحفادُ يَياطي، في عمل تخليصه.»
Verse 3
येषां तथा राम समारभन्न्ते कार्याणि नाथा: स्वमतेन लोके । ते नाथवन्तः पुरुषप्रवीरा नानाथवत् कृच्छुमवाप्लुवन्ति
يا راما، إن في الدنيا رجالًا من خيرة الأبطال، يبتدئ أنصارُهم الأعمالَ لهم وفق ما يرونه هم من رأي؛ فأولئك يُعدّون حقًّا «ذوي سند». لا ينالهم العسر كما ينال من لا ناصر له.
Verse 4
कस्मादिमौ रामजनार्दनौ च प्रद्युम्नसाम्बी च मया समेतौ । वसन्त्यरण्ये सहसोदरीयै- स्त्रैलोक्पनाथानभिगम्य पार्था:
قال بالاراما: «لِمَ نحنُ هنا مجتمعون—راما (بالاراما) وجناردانا (كريشنا)، ومعنا براديومنـا وسامبا—معي، ومع ذلك فإن أبناء كونتي، آل بارثا، حتى بعد أن قصدوا سادة العوالم الثلاثة، ما زالوا يقيمون في الغابة مع إخوتهم؟»
Verse 5
निर्यातु साध्वद्य दशार्हसेना प्रभूतनानायुधचित्रवर्मा | यमक्षयं गच्छतु धार्त॑राष्ट्र: सबान्धवो वृष्णिबलाभिभूत:
قال بالاراما: «لتخرج جيوش الدشارها (الفريشني) في هذا اليوم نفسه—مُتسلّحةً بسلاحٍ كثيرٍ متنوّع، ومتدرّعةً بدروعٍ بهيّةٍ متعددة الألوان. وليذهب ابنُ دريتاراشترا، وقد قهرته بأسُ الفريشني، إلى مقام يَما مع ذويه وأقربائه.»
Verse 6
त्वं होव कोपात् पृथिवीमपीमां संवेष्टयेस्तिष्ठतु शार्ड्र्धन्चा । स धार्तराष्ट्रं जहि सानुबन्ध॑ वृत्रं यथा देवपतिम॑हिन्द्र:
قال بالاراما: «إنك في غضبك تستطيع أن تُطوِّق هذه الأرض كلها بلهيب قدرتك—فليكن ذلك. فاضرب ابنَ دريتاراشترا مع حلفائه وأتباعه، كما قتل إندرا، سيدُ الآلهة، فِرترا.»
Verse 7
भ्राता च मे य:ः स सखा गुरुश्न जनार्दनस्यात्मसममश्ष पार्थ: । यदर्थमैच्छन् मनुजा: सुपुत्रं शिष्यं गुरुश्नाप्रतिकूलवादम्
قال بالاديفا: «إن ذلك البارثا (أرجونا)—وهو أخي وصديقي، وهو أيضاً كبيرٌ مُوقَّر، وهو عند جناردانا (كريشنا) بمنزلة النفس من النفس—ينبغي أن يقف جانباً لهذه الغاية. فقد آن الأوان لتحقيق المقصد الذي لأجله يتمنى الناس ابناً نبيلاً وتلميذاً لا يعارض معلمه: أن تُصان الأمانة، ويُحفظ ضبط النفس، ويُقام السلوك القويم حين ينادي الواجب.»
Verse 8
यदर्थमभ्युद्यतमुत्तमं तत् करोति कर्माग्रयमपारणीयम् । तस्यास्त्रवर्षाण्यहमुत्तमास्त्रै- विंहत्य सर्वाणि रणेडभिभूय
قال بالاراما: «ذلك المقصد بعينه الذي من أجله يرفع الابنُ الصالح أو التلميذُ الجدير أرفعَ الأسلحة ويأتي بأعظم الأفعال ببأسٍ لا يُحدّ—هذا أوانُ إتمامه. ففي ساحة القتال سأحطم، بأسلحتي العليا، كلَّ وابلِ أسلحة العدو، ثم أغلبهم في المعمعة وأُبدِّد جميع قواتهم.»
Verse 9
कायाच्छिर: सर्पविषाग्निकल्पै: शरोत्तमैरुन्मथितास्मि राम । खड्गेन चाहं निशितेन संख्ये कायाच्छिरस्तस्य बलात् प्रमथ्य
قال بالاراما: «يا راما، إن سهامًا ممتازة تمزّقني وتهزّني—مروّعة كالأفاعي والسمّ والنار. ومع ذلك، في غمار القتال، بسيفي الحادّ سأنتزع رأسه عن جسده قسرًا وأطرحه صريعًا.»
Verse 10
ततो<स्य सर्वाननुगान् हनिष्ये दुर्योधन चापि कुरूँश्व॒ सर्वान् आत्तायुधं मामिह रौहिणेय पश्यन्तु भैमा युधि जातहर्षा:
«ثم سأقتل جميع أتباعه، ودوريودhana أيضًا—بل جميع الكورو. يا ابن روهيṇī، فليشهدني هؤلاء المحاربون الشبيهون ببهِيما، وقد علت نفوسهم نشوة القتال، وأنا هنا والسلاح في يدي.»
Verse 11
निघ्नन्तमेक॑ कुरुयो धमुख्या- नग्निं महाकक्षमिवान्तकाले । प्रद्युम्नमुक्तान् निशितान् न शक्ता: सोढुं कृपद्रोणविकर्णकर्णा:
أعلن بالاديفا: «كما أن حريقًا عظيمًا في آخر الزمان يحيل أكوام العشب اليابس رمادًا، كذلك سأقضي وحدي على أبطال جيش الكورو الأوائل على مرأى من الجميع. ثم إن السهام الحادّة التي يطلقها براديومنَة لا يملك كريبا ولا درونا ولا فيكارنا ولا كارنا قوة احتمالها.»
Verse 12
जानामि वीर्य च जयात्मजस्य कार्ष्णिर्भवत्येष यथा रणस्थ: । साम्ब: ससूतं सरथं भुजाभ्यां दुःशासन शास्तु बलात् प्रमथ्य
قال بالاديفا: «إني أعلم بأس ابن جايَا. فإذا وقف في ساحة الوغى بدا كأنه من نسل كريشنا حقًّا. فليدعُ البطل سامبا بقوة ذراعيه إلى سحق جيش العدو وإخضاع دوحشاسانا—وليقبض عليه مع سائقه وعربته بين ذراعيه الاثنتين.»
Verse 13
न विद्यते जाम्बवतीसुतस्य रणे विषदह्ां हि रणोत्कटस्य । एतेन बालेन हि शम्बरस्य दैत्यस्य सैन्यं सहसा प्रणुन्नम्
قال بالاديفا: «إن ابن جامبَفَتي—العنيف في زحمة القتال—لا موضع لليأس عنده في الحرب. بل إنه وهو بعدُ غلامٌ قد حطّم سريعًا جيش الشيطان شَمبَرا.»
Verse 14
वृत्तोरुरत्यायतपीनबाहु- रेतेन संख्ये निहतो<श्वचक्र: । को नाम साम्बस्य महारथस्य रणे समक्ष रथमभ्युदीयात्
قال بالاديفا: «بفخذين مستديرين وذراعين طويلتين شديدتي القوة، لقد حطّم في زحمة القتال صفوفًا كاملة من فرسان الخيل. فمن ذا الذي يستطيع في ساحة الحرب أن يخرج لمواجهة عربة سامبا، ذلك المقاتل العظيم على العربة؟»
Verse 15
यथा प्रविश्यान्तरमन्तकस्य काले मनुष्यो न विनिष्क्रमेत | तथा प्रविश्यान्तरमस्य संख्ये को नाम जीवन पुनरात्रजेत
قال بالاراما: «كما أنّ الإنسان إذا جاء أجله الأخير ووقع في عناق أَنْتَكَ (الموت) لا يستطيع أن يفلت منه أبدًا، كذلك في ساحة القتال—إذا دخل أحدٌ في قبضة هذا البطل—فأيُّ محارب يمكنه أن يعود حيًّا؟»
Verse 16
द्रोणं च भीष्मं च महारथौ तौ सुतैर्वृत॑ चाप्पथ सोमदत्तम् । सर्वाणि सैन्यानि च वासुदेव: प्रधक्ष्यते सायकवल्लिजालै:
قال بالاديفا: «إن شاء المبارك شري كريشنا، ابن فاسوديفا، استطاع أن يحرق إلى رمادٍ بشبكة سهامه المتّقدة درونا وبيشما—وهما من أشهر المها-رثيين—ومعهم سوماداتا محاطًا بأبنائه، بل وجميع الجيوش أيضًا. فالمقصود ليس مجرد القوة، بل كبح القوة وتسخيرها في خدمة الدارما.»
Verse 17
कि नाम लोकेष्वविषह्ाुमस्ति कृष्णस्य सर्वेषु सदेवकेषु । आत्तायुथस्योत्तमबाणपाणे- श्रक्रायुधस्याप्रतिमस्य युद्धे
قال بالاديفا: «أيُّ شيءٍ، حقًّا، في العوالم كلّها—مع الآلهة—يكون عسيرًا أو مستحيلًا على كريشنا؟ يحمل السلاح، ويقبض على أبرع السهام، ويُشهر القرص كأنه سلاح إندرا نفسه؛ وهو في الحرب لا نظير له.»
Verse 18
ततोडनिरुद्धो5प्यसिचर्मपाणि- महीमिमां धार्तराष्ट्रविसंज्ञै: । ह्वतोत्तमाड्रैन्निहतै: करोतु कीर्णा कुशैवेदिमिवाध्वरेषु
ثم ليدعْ حتى أنيرودها—والسلاح بيده، سيفًا وترسًا—يُغَطّي هذه الأرض بأبناء دْهريتاراشترا المطروحين بلا وعي، وقد قُطِعت رؤوسهم في القتال، كما تُنثَر وتُغطّى المذبح في الطقوس القربانية بعشب الكوشا. إن هذه الصورة تُؤطّر المذبحة المقبلة بوصفها انقلابًا كئيبًا لنظام الشعائر: فالميدان يصير مذبحًا، والساقطون يصبحون «الغطاء» الرهيب المبسوط على التراب.
Verse 19
गदोल्मुकौ बाहुकभानुनीथा: शूरश्न संख्ये निशठ: कुमार: । रणोत्कटौ सारणचारुदेष्णौ कुलोचितं विप्रथयन्तु कर्म
قال بالاديفا: «فليُبدِ غادا وأُلموكا، وكذلك باهوكا وبانو ونيثا؛ وليتقدّم الفتى البطل نيشاطها في غمرة القتال؛ وليُظهر سارانا وتشاروديشنا—وهما شديدان في زحمة الحرب—أفعالًا تليق بسلالتهما. في هذا الصراع العادل، ليكن بأسهم سندًا لشرف البيت، وليؤدّوا الواجب الذي يقع على عاتق ذوي القربى في زمن الفتنة.»
Verse 20
सवृष्णि भोजान्धकयो धमुख्या समागता सात्वतशूरसेना । हत्वा रणे तान् धृतराष्ट्रपुत्रा- ल्लोके यश: स्फीतमुपाकरोतु
قال بالاراما: «ليجتمع جيش اليادافا الباسل—وفي مقدّمته الفِرِشنيون والبُهوجا والأندهكا—قويًّا متماسكًا، وليصرع أبناء دِهرتاراشترا في ساحة القتال، وبذلك لتنتشر في العالم شهرتهم المضيئة على مدى بعيد.»
Verse 21
ततो<भिमन्यु: पृथिवीं प्रशास्तु यावद् व्रतं धर्मभृतां वरिष्ठ: । युधिष्ठिर: पारयते महात्मा द्यूते यथोक्त कुरुसत्तमेन
ثم قال بالاراما: «ليحكم أبهيمانيو هذه الأرض إلى أن يُتمّ يودهيشثيرا العظيم النفس—وهو أرفع من يحملون الدارما—نذره الذي التزمه، كما أُعلن يوم لعبة النرد على لسان خير الكورو.»
Verse 22
अस्मप्प्रमुक्तिविशिखैर्जितारि- स्ततो महीं भोक्ष्यति धर्मराज: । निर्धार्तराष्ट्रां हतसूतपुत्रा- मेतद्धि नः कृत्यतमं यशस्यथम्
قال بالاراما: «بعد أن يُتمّ نذره، سيغلب الدهرماراجا أعداءه بالسهام نفسها التي أطلقناها نحن، ثم ينعم بسيادة هذه الأرض. وحينئذٍ تكون الأرض قد خلت من أبناء دِهرتاراشترا، ويكون كارنا—ابن سائق العربة—قد قُتل. إن تمّ ذلك، كان لنا أليق الأعمال وأشدّها زيادةً في الذكر والصيت.»
Verse 23
वायुदेव उवाच असंशयं माधव सत्यमेतद् गृह्नीम ते वाक्यमदीनसत्त्व । स्वाभ्यां भुजाभ्यामजितां तु भूमिं नेच्छेत् कुरूणामृषभ: कथंचित्
قال فايوديفا: «يا ماذافا، إن هذا حقّ لا ريب فيه. يا من لا يلين عزمه، أقبل قولك. غير أن ثور الكورو لن يرغب قطّ، تحت أي ظرف، في أن يأخذ أرضًا لم يظفر بها بقوة ذراعيه هو.»
Verse 24
न होष कामाजन्न भयान्न लोभाद् युधिष्ठटिरो जातु जह्यात् स्वधर्मम् भीमार्जुनौ चातिरथौ यमौ च तथैव कृष्णा द्रुपदात्मजेयम्
قال فايُو: «لا بدافع الشهوة، ولا بدافع الخوف، ولا بدافع الطمع، يترك يودهيشثيرا قطّ دارماه الخاص. وكذلك بهيما وأرجونا—وهما من فرسان الأتيراثا ذوي المقام الأعلى—ومعهما التوأمان ابنا مادري، وكذلك كِرِشنا ابنة دروبادا، لا يتركون سبيل السلوك القويم.»
Verse 25
उभौ हि युद्धे5प्रतिमौ पृथिव्यां वृकोदरश्रैव धनंजयश्न । कस्मान्न कृत्स्नां पृथिवीं प्रशासे- न्माद्रीसुताभ्यां च पुरस्कृतोडयम्
قال فايُو: «حقًّا، على هذه الأرض لا نظير لوِرِكودَرا (بهيما) ولا لدهَنَنْجَيا (أرجونا) في القتال. فإذا كان معه هذان—ومعه أيضًا ابنا مادري—فلماذا لا يقدر يودهيشثيرا على حكم الأرض كلها؟»
Verse 26
यदा तु पञ्चालपतिर्महात्मा सकेकयश्षेदिपतिर्वयं च । युध्येम विक्रम्य रणे समेता- स्तदैव सर्वे रिपवो हि न स्यु:
ولكن حين يتّحد ذو النفس العظيمة، سيد البانچالا، مع ملك الكايكايا وحاكم تشيدي ومعنا نحن أيضًا، فنقتحم ساحة القتال ونُظهر بأسنا، فعندئذٍ، في تلك اللحظة بعينها، يزول جميع الأعداء ولا يبقى لهم أثر.
Verse 27
युधिछिर उवाच नेदं चित्र माधव यद् ब्रवीषि सत्य॑ तु मे रक्ष्यतमं न राज्यम् । कृष्णस्तु मां वेद यथावदेक: कृष्णं च वेदाहमथो यथावत्
قال يودهيشثيرا: «يا ماذافا، ليس فيما تقول عجبٌ على بطلٍ مثلك. أما أنا فحراسةُ الحقّ هي الواجب الأعلى، لا نيلُ المملكة. كِرِشنا وحده يعرفني على حقيقتي، وأنا أيضًا أعرف كِرِشنا في طبيعته الحقة كما هي.»
Verse 28
यदैव काल पुरुषप्रवीरो वेत्स्यत्ययं माधव विक्रमस्य । तदा रणे त्वं च शिनिप्रवीर सुयोधनं जेष्यसि केशवश्व
«يا ماذافا، يا بطلَ آلِ شِني! متى أدرك كِرِشنا، جوهرةَ الرجال، أن أوانَ إظهار البأس قد حان، فعندئذٍ في ساحة القتال ستغلب أنتَ وكِشَفا معًا سُيُودَهَنَة (دوريودَهَنَة).»
Verse 29
प्रतिप्रयान्त्वद्य दशार्हवीरा दृष्टोडस्मि नाथैर्नरलोकनाथी: । धर्मेडप्रमादं कुरुताप्रमेया द्रष्टास्मि भूय: सुखिन: समेतान्
فَلْيَنْصَرِفِ اليومَ أبطالُ الدَّشارهَة. لقد نِلتُ البركةَ إذ رأيتُكم—أنتم حُماتي، بل حُرّاسُ عالمِ البشرِ كلِّه. لقد جلبَ لي هذا اللقاءُ فرحًا عظيمًا. يا ذوي القوّةِ التي لا تُقاس، الزموا اليقظةَ دائمًا في إقامةِ الدَّرما وحمايتِها. عسى أن أراكم ثانيةً جميعًا، سعداءَ مجتمعينَ كالأصدقاء.
Verse 30
तेडन्योन्यमामन्त्रय तथाभिवाद्य वृद्धान् परिष्वज्य शिशुंश्व॒ सर्वान् । यदुप्रवीरा: स्वगृहाणि जग्मु- स््ते चापि तीर्थान्यनुसंविचेरु:
ثم استأذن بعضُهم بعضًا مودِّعين، وقدّموا التحيةَ الواجبةَ للشيوخ، واحتضنوا الأطفالَ بمودّةٍ صادقة، والتقوا بسائر الناس على ما يليق من الأدب، ثم انطلقوا إلى الجهات التي يرغبونها. فعاد أبطالُ اليادُو إلى ديارهم، أمّا الباندافا فاستأنفوا، كما من قبل، تجوالهم بين التيـرثات—المعابر المقدّسة—ماضين في سيرة الحجّ والزهد وضبط النفس.
Verse 31
विसृज्य कृष्णं त्वथ धर्मराजो विदर्भराजोपचितां सुतीर्थाम् जगाम पुण्यां सरितं पयोष्णीं सभ्रातृभृत्य: सह लोमशेन
وبعد أن ودّع شري كريشنا، مضى دهرماراجا يودهيشثيرا مع لومَشَة وإخوته وخدمه إلى ضفاف نهر بايوشنِي الطاهر، ذلك النهر الذي كان ملكُ فيداربها يجلّه ويعبده، وفيه مواطنُ تيـرثا فاضلة.
Verse 32
सुतेन सोमेन विमिश्रतोयां पय: पयोष्णीं प्रति सो5ध्युवास । द्विजातिमुख्यैर्मुदितैर्महात्मा संस्तूयमान: स्तुतिभिर्वराभि:
كانت مياهُه ممزوجةً بالسُّوما، شرابِ القربان في اليَجْنَة. فلما بلغ الملكُ العظيمُ النفس ضفةَ بايوشنِي شرب من مائها وأقام هناك. وعندئذٍ أخذَ سادةُ الثنائيّي الميلاد، وقد امتلأت قلوبُهم سرورًا، يثنون عليه بأناشيدَ رفيعة.
Verse 120
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां यादवगमने विंशत्यधिकशततमो<ध्याय:
وهكذا، في «شري مهابهاراتا»، ضمن «فانا بارفا»—وخاصةً قسم «تيرثاياترا بارفا»—في سردِ حجّ لومَشَة وفي الحلقة المتعلّقة بقدوم/انصراف اليادافا، تنتهي هنا المئةُ والعشرون من الفصول.
Whether immediate, capability-backed intervention is justified, or whether adherence to satya and the exile agreement must override expedient retaliation despite strategic advantage.
Ethical legitimacy depends not only on power but on timing and vow fidelity; dharma is upheld by disciplined restraint, with action reserved for the proper moment (kāla) rather than impulse.
No explicit phalaśruti is stated; the meta-point is conveyed narratively through Yudhiṣṭhira’s prioritization of satya over sovereignty and the framing of pilgrimage continuation as dharma-in-practice.
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