उद्योगपर्व — अध्याय ९३: कृष्णस्य धृतराष्ट्रोपदेशः
Kṛṣṇa’s Counsel to Dhṛtarāṣṭra in the Assembly
अलसीके फूलकी भाँति मनोहर श्याम कान्तिवाले पीताम्बरधारी श्रीकृष्ण उस सभाके मध्यभागमें स्वर्ण-पात्रमें रखी हुई नीलमणिके समान शोभा पा रहे थे ।। ततस्तृष्णीं सर्वमासीद् गोविन्दगतमानसम् | न तत्र कश्चित् किज्चिद् वा व्याजहार पुमान् क्वचित्,उस समय वहाँ सबका मन भगवान् गोविन्दमें ही लगा हुआ था। अतः सभी चुपचाप बैठे थे। कोई मनुष्य कहीं कुछ भी बोल नहीं रहा था
tatas tṛṣṇīṁ sarvam āsīd govinda-gata-mānasam | na tatra kaścit kiñcid vā vyājahāra pumān kvacit ||
ثم عمّ الصمتُ كلَّ شيء، إذ كانت قلوبُ الحاضرين وعقولُهم مشدودةً إلى غوڤيندا. وفي ذلك المجلس لم ينطق أحدٌ، في أي موضعٍ كان، بكلمةٍ واحدة—هكذا كان السكونُ المولودُ من الإجلال والانتباه الباطني.
वैशम्पायन उवाच