उद्योगपर्व — अध्याय ९३: कृष्णस्य धृतराष्ट्रोपदेशः
Kṛṣṇa’s Counsel to Dhṛtarāṣṭra in the Assembly
इस प्रकार श्रीमह्याभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वनें श्रीकृष्णवाक्यविषयक तिरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ९३ ॥। [दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल २३ “लोक हैं।] अपन क्ाा बछ। अर: 2 चतुर्नवतितमो< ध्याय: दुर्योधन एवं शकुनिके द्वारा बुलाये जानेपर भगवान् श्रीकृष्णका रथपर बैठकर प्रस्थान एवं कौरवसभामें प्रवेश और स्वागतके पश्चात् आसनग्रहण वैशम्पायन उवाच तथा कथयतोरेव तयोरबुद्धिमतोस्तदा । शिवा नक्षत्रसम्पन्ना सा व्यतीयाय शर्वरी,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! उस समय बुद्धिमान श्रीकृष्ण तथा विदुरके इस प्रकार वार्तालाप करते हुए ही वह नक्षत्रोंसे सुशोभित मंगलमयी रात्रि बहुत-सी व्यतीत हो चुकी थी इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें श्रीकृष्णका सभामें प्रवेशविषयक चौरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ९४ ॥ [दाक्षिणात्य अधिक पाठके १० ६ श्लोक मिलाकर कुल ६४ ६ “लोक हैं।] न२््च्स्स्स्ारिस्सि ह्य £:ानप्ट् पञ्चनवतितमो< ध्याय: कौरवसभामें श्रीकृष्णका प्रभावशाली भाषण वैशम्पायन उवाच तेष्वासीनेषु सर्वेषु तूष्णीम्भूतेषु राजसु । वाक्यमभ्याददे कृष्ण: सुदंष्टरो दुन्दुभिस्वन:
vaiśampāyana uvāca | tathā kathayator eva tayor buddhimatōs tadā | śivā nakṣatra-sampannā sā vyatīyāya śarvarī ||
قال فَيْشَمْپايَنَة: يا جَنَمَيْجَيا! في ذلك الحين، وبينما كان الحكيمان—شري كريشنا وڤيدورا—يتحادثان على هذا النحو، كانت تلك الليلة المباركة، الموشّاة بالنجوم، قد مضى أكثرُها.
वैशम्पायन उवाच