विदुरस्य कृष्णं प्रति शमोपदेशः
Vidura’s Counsel to Krishna on the Limits of Peace
(द्विषदन्न न भोक्तव्यं द्विषन्तं नैव भोजयेत् । पाण्डवान् द्विषसे राजन् मम प्राणा हि पाण्डवा: ।। ) “जो द्वेष रखता हो, उसका अन्न नहीं खाना चाहिये। द्वेष रखनेवालेको खिलाना भी नहीं चाहिये। राजन! तुम पाण्डवोंसे द्वेष रखते हो और पाण्डव मेरे प्राण हैं। सर्वमेतन्न भोक्तव्यमन्नं दुष्टगाभिसंहितम् । क्षत्तुरेकस्य भोक्तव्यमिति मे धीयते मति:,“तुम्हारा यह सारा अन्न दुर्भावनासे दूषित है। अतः मेरे भोजन करनेयोग्य नहीं है। मेरे लिये तो यहाँ केवल विदुरका ही अन्न खानेयोग्य है। यह मेरी निश्चित धारणा है”
dviṣadannaṁ na bhoktavyaṁ dviṣantaṁ naiva bhojayet | pāṇḍavān dviṣase rājan mama prāṇā hi pāṇḍavāḥ ||
قال فايشَمبايانا: «لا ينبغي أن يُؤكل طعامُ من يحمل الحقد، ولا أن يُطعَم الحاقد. أيها الملك، إنك تبغض الباندافا، والباندافا عندي كأنهم روحي. لذلك فإن هذا الطعام كله، وقد تلوّث بسوء النية، لا يليق بي أن أتناوله. وفي حكمي، لا يستحق أن آكل هنا إلا طعامَ فيدورا.»
वैशम्पायन उवाच