कुन्ती-विलापः तथा गोविन्द-आश्वासनम्
Kuntī’s Lament and Govinda’s Consolation
कृतातिथ्यस्तु गोविन्द: सर्वान् परिहसन् कुरून् । आस्ते साम्बन्धिकं कुर्वन् कुरुभि: परिवारित:,उनका आतिथ्य ग्रहण करके भगवान् गोविन्द हँसते हुए कौरवोंके साथ बैठ गये और सबसे अपने सम्बन्धके अनुसार यथायोग्य व्यवहार करते हुए कौरवोंसे घिरे हुए कुछ देर बैठे रहे
فلما قُضِيَت ضيافته، جلس غوڤيندا بين جميع الكورو وهو يبتسم مازحًا، محاطًا بهم، يعامل كلَّ واحدٍ بما يليق بقرابته وصِلته، ومكث بينهم هنيهة.
वैशम्पायन उवाच