Udyoga-parva Adhyāya 34 — Vidura’s Counsel on Deliberation, Speech-Discipline, and Dharmic Kingship
पाप॑ं कुर्वन् पापकीर्ति: पापमेवा श्ुते फलम् | पुण्य॑ कुर्वन् पुण्यकीर्ति: पुण्यमत्यन्तमश्चुते,पापकीर्तिवाला निन्दित मनुष्य पापाचरण करता हुआ पापके फलको ही प्राप्त करता है और पुण्य कीर्तिवाला (प्रशंसित) मनुष्य पुण्य करता हुआ अत्यन्त पुण्यफलका ही उपभोग करता है
من يصنع الإثم تلاحقه سمعةُ الإثم، ولا ينال إلا ثمرةَ الإثم. ومن يصنع البرّ تلازمه سمعةُ البرّ، ويذوق ثمرةَ البرّ ذوقًا عظيمًا.
विदुर उवाच