Adhyaya 32: Saṃjaya’s Return, Audience with Dhṛtarāṣṭra, and Ethical Admonition
विदुर उवाच (राजा लक्षणसम्पन्नस्त्रैलोक्यस्याधिपो भवेत् । प्रेष्यस्ते प्रेषितश्वैव धृतराष्ट्र युधिष्ठिर: ।। विदुरजी बोले--महाराज धुृतराष्ट्र! श्रेष्ठ लक्षणोंसे सम्पन्न राजा युधिष्ठिर तीनों लोकोंके विपरीततरकश्न त्वं भागधेये न सम्मतः । आर्चिषां प्रक्षयाच्चैव धर्मात्मा धर्मकोविद: ।। आप धर्मात्मा और धर्मके जानकार होते हुए भी आँखोंकी ज्योतिसे हीन होनेके कारण उन्हें पहचान न सके, इसीसे उनके अत्यन्त विपरीत हो गये और उन्हें राज्यका भाग देनेमें आपकी सम्मति नहीं हुई। आनृशंस्यादनुक्रोशाद् धर्मात् सत्यात् पराक्रमात् । गुरुत्वात् त्वयि सम्प्रेक्ष्य बहून् क्लेशांस्तितिक्षते ।। युधिष्ठिरमें क्रूरताका अभाव, दया, धर्म, सत्य तथा पराक्रम है; वे आपकमें पूज्यबुद्धि रखते हैं। इन्हीं सदगुणोंके कारण वे सोच-विचारकर चुपचाप बहुत-से क्लेश सह रहे हैं। दुर्योधने सौबले च कर्णे दुःशासने तथा । एतेष्वैश्वर्यमाधाय कथं त्वं भूतिमिच्छसि ।। आप दुर्योधन, शकुनि, कर्ण तथा दुःशासन-जैसे अयोग्य व्यक्तियोंपर राज्यका भार रखकर कैसे कल्याण चाहते हैं? आत्मज्ञानं समारम्भस्तितिक्षा धर्मनित्यता । यमर्थान्नापकर्षन्ति स वै पण्डित उच्यते ।। ) अपने वास्तविक स्वरूपका ज्ञान, उद्योग, दुःख सहनेकी शक्ति और धर्ममें स्थिरता--ये गुण जिस मनुष्यको पुरुषार्थसे च्युत नहीं करते, वही पण्डित कहलाता है। निषेवते प्रशस्तानि निन्दितानि न सेवते । अनास्तिक: श्रद्धधान एतत् पण्डितलक्षणम्,जो अच्छे कर्मोका सेवन करता और बुरे कर्मोसे दूर रहता है, साथ ही जो आस्तिक और श्रद्धालु है, उसके वे सदगुण पण्डित होनेके लक्षण हैं
vidura uvāca |
rājā lakṣaṇasampannastrailokyasyādhipo bhavet |
preṣyaste preṣitaścaiva dhṛtarāṣṭra yudhiṣṭhiraḥ ||
قال فيدورا: «يا ملك دْهْرِتَرَاشْتْرَا، إن يودهيشثيرا موصوفٌ بسمات الملك الكامل؛ فمثل هذا الملك كأنه سيد العوالم الثلاثة. وهو خادمك المخلص، لا يتحرك إلا إذا أُرسل وأُمِر—ومع ذلك عاملته كخصم.»
विदुर उवाच
Vidura asserts that legitimate sovereignty rests on virtues and auspicious royal qualities; a ruler should recognize and honor dharmic excellence (embodied by Yudhiṣṭhira) rather than alienate it through partiality or misjudgment.
In the Udyoga Parva’s pre-war negotiations and counsel, Vidura admonishes King Dhṛtarāṣṭra, pointing out that Yudhiṣṭhira remains loyal and dutiful, and that Dhṛtarāṣṭra’s stance against him is ethically and politically self-defeating.