Adhyaya 32: Saṃjaya’s Return, Audience with Dhṛtarāṣṭra, and Ethical Admonition
न स्वे सुखे वै कुरुते प्रहर्ष नान्यस्य दु:खे भवति प्रह्ृष्ट: । दत्त्वा न पश्चात् कुरुतेडनुतापं स कथ्यते सत्पुरुषार्यशील:,जो अपने सुखमें प्रसन्न नहीं होता, दूसरेके दुःखके समय हर्ष नहीं मानता और दान देकर पश्चात्ताप नहीं करता, वह सज्जनोंमें सदाचारी कहलाता है
من لا يطغى فرحًا بسعادته، ولا يَشْمَتُ بمصيبة غيره، وإذا أعطى لم يندم بعد ذلك—فذلك يُقال له: ساتبوروشا، رجلٌ صالح ذو خُلُقٍ نبيل.
विदुर उवाच