उद्योगपर्व — अध्याय २५: संजयदूतवाक्यम्
Sañjaya’s Envoy-Speech on Peace
नाश्रेयानीश्वरो विग्रहाणां नाश्रेयान् वै गीतशब्दं शृणोति । नाश्रेयान् वै सेवते माल्यगन्धान् न चाप्यश्रेयाननुलेपनानि,जो पुण्यात्मा नहीं है, वह संग्रामोंमें विजयी नहीं होता। जो पुण्यात्मा नहीं है, वह अपना यशोगान नहीं सुनता। जिसने पुण्य नहीं किया है, वह मालाएँ और गन्ध नहीं धारण कर सकता। जो पुण्यात्मा नहीं है, वह चन्द्र आदि अवलेपनका भी उपयोग नहीं कर सकता। जिसने पुण्य नहीं किया है, वह अच्छे कपड़े नहीं धारण करता। यदि राजा धुृतराष्ट्र पुण्यवान् न होते, तो हमलोगोंको कुरुदेशसे दूर कैसे कर देते? तथापि यह भोगतृष्णा अज्ञानी दुर्योधन आदिके ही योग्य है, जो प्रायः (सभीके) शरीरोंके भीतर अन्त:करणको पीड़ा देती रहती है
sañjaya uvāca | nāśreyān īśvaro vigrahāṇāṃ nāśreyān vai gītaśabdaṃ śṛṇoti | nāśreyān vai sevate mālyagandhān na cāpy aśreyān anulepanāni |
قال سنجيا: «من خلا من الفضل لا يصير سيدًا حقًّا في ميادين الصراع، ولا يسمع صوت الأناشيد التي تُتلى في مدحه. ومن لم يدّخر برًّا لا ينعم بالأكاليل والعطور، ولا حتى باستعمال الأدهان. وهكذا تُصوَّر الرفعة والكرامة ثمرةً للاستقامة الماضية؛ أمّا شهوة التمتّع إذا لم تُضبط بالحكمة فإنها تغدو عذابًا باطنًا.»
संजय उवाच