Udyoga-parva Adhyāya 137 — Bhīṣma–Droṇa Counsel and the Ethics of Restraint
नकुलं सहदेवं च बलवीर्यसमन्वितौ | सहायं वासुदेवं च न क्षंस्पति युधिष्ठिर:,“अब अस्त्रविद्यामें पारंगत अर्जुन और युद्धका दृढ़ निश्चय रखनेवाले भीमसेनको पाकर गाण्डीव धनुष, अक्षय बाणोंसे भरे हुए दो तरकस, दिव्य रथ और ध्वजको हस्तगत करके, बल और पराक्रमसे सम्पन्न नकुल और सहदेवको युद्धके लिये उद्यत देखकर तथा भगवान् श्रीकृष्णको भी अपनी सहायताके रूपमें पाकर युधिष्ठिर तुम्हारे पूर्व अपराधोंको क्षमा नहीं करेंगे
nakulaṃ sahadevaṃ ca balavīryasamanvitau | sahāyaṃ vāsudevaṃ ca na kṣaṃsyati yudhiṣṭhiraḥ ||
قال فايشَمبايانا: «لن يغفر يودهيشثيرا ذنوبك السابقة، وقد صار معه ناكولا وسهاديفا—وهما موفوران قوةً وبأسًا—ومعه فاسوديفا (كريشنا) نفسه حليفًا.»
वैशम्पायन उवाच