न लॉ ंटडिड: - एक समय राजा रैवत अपनी पुत्रीके साथ उसके लिये वरका अनुसंधान करने ब्रह्माजीके पास गये थे। वहाँसे लौटते समय उन्होंने मन्दराचलके पुण्य प्रदेशोंमें गन्धवॉका सामगान सुना और कुछ देर ठहर गये। वहाँका थोड़ा-सा भी समय मनुष्यलोकके महान् कालके बराबर होता है। राजा जब लौटकर राजधानीमें आये; तब सत्ययुग और त्रेता बीतकर द्वापरका अन्तिम भाग व्यतीत हो रहा था। मन्त्री और परिवारके सभी लोग कालके गालमें जा चुके थे। उन दिनों उनकी राजधानी कुशस्थलीके स्थानपर दिव्य द्वारकापुरीका निर्माण हो चुका था। राजाने अपनी पुत्री रेवतीका विवाह बलरामजीसे कर दिया और स्वयं वे वनमें तपस्या करनेके लिये चले गये। दशाधिकशततमो&् ध्याय: पश्चिमदिशाका वर्णन युपर्ण उवाच इयं दिग् दयिता राज्ञो वरुणस्य तु गोपते: । सदा सलिलराजस्य प्रतिष्ठा चादिरेव च,गरुड़ कहते हैं--गालव! यह जो सामनेकी दिशा है, जलके स्वामी दिक्पाल राजा वरुणको सदा ही अत्यन्त प्रिय है। यही उनका आश्रय और उत्पत्ति-स्थान है
yuparṇa uvāca | iyaṁ dig dayitā rājño varuṇasya tu gopateḥ | sadā salilarājasya pratiṣṭhā cādir eva ca ||
قال يوبَرْنا: «يا غالَفا! إن هذه الجهة التي أمامنا محبوبةٌ على الدوام للملك فَرونا، حارس الجهات وسيد المياه. فهي مقرُّ سلطان الماء وموضعُ استقراره، بل هي أيضًا منبعُه الأول.»
युपर्ण उवाच
The verse frames the quarters of space as morally and ritually meaningful: each direction has a guardian (dikpāla). Recognizing Varuṇa’s domain emphasizes reverence for cosmic order (ṛta/dharma) and the sanctity of natural elements like water.
Yuparṇa (identified with Garuḍa in the prose context) points out a particular direction to Gālava and explains that it is especially dear to Varuṇa, describing it as Varuṇa’s seat and place of origin—part of a broader description of the quarters.