Vāmadeva’s Rājadharma: Norm-Setting, Counsel, and the Prevention of Rāṣṭra-Vināśa (वामदेव-प्रोक्तं राजधर्मम्)
राजा यदि समर्थ हो तो उत्तम सुखका अनुभव करे और करावे तथा आपत्तिमें पड़ जाय तो उसके निवारणका प्रयत्न करे। ऐसा करनेसे वह सब प्राणियोंका प्रिय होता है और कभी राजलक्ष्मीसे भ्रष्ट नहीं होता ।। अप्रियं यस्य कुर्वीत भूयस्तस्य प्रियं चरेत् । नचिरेण प्रिय: स स्याद् यो5प्रिय: प्रियमाचरेत्,राजाको चाहिये कि यदि किसीका अप्रिय किया हो तो फिर उसका प्रिय भी करे। इस प्रकार यदि अप्रिय पुरुष भी प्रिय करने लगता है तो थोड़े ही समयमें वह प्रिय हो जाता है
apriyaṁ yasya kurvīta bhūyas tasya priyaṁ caret | na cireṇa priyaḥ sa syād yo 'priyaḥ priyam ācaret ||
يُقرِّر فاماديفا قاعدةً عملية في المُلك: إن كان الملك قادرًا فليذق أطيب السعادة وليُذِقها، وإن وقع في شدةٍ فليجتهد في دفعها. بذلك يصير محبوبًا لدى جميع الكائنات ولا يُحرَم قط من حظِّ الملك. ثم يقول: ينبغي للملك إن أساء إلى أحدٍ بما يكرهه أن يتبع ذلك بما يُرضيه. فمن قابل الكراهة بفعلٍ مقصود من الإحسان، سرعان ما يغدو محبوبًا حتى عند من أُسيء إليهم.
वामदेव उवाच
If one has caused displeasure, one should intentionally follow it with a pleasing, beneficial act; goodwill after harm quickly restores affection and trust.
In Śānti Parva’s instruction on rājadharma, the sage Vāmadeva addresses the ideal conduct of a king, emphasizing reconciliation and the political-ethical value of making amends.