Vāmadeva’s Rājadharma: Norm-Setting, Counsel, and the Prevention of Rāṣṭra-Vināśa (वामदेव-प्रोक्तं राजधर्मम्)
यद् वृत्तमुपजीवन्ति प्रकृतिस्थस्य मानवा: । तदेव विषमस्थस्य स्वजनो<पि न मृष्यते,अच्छी अवस्थामें रहनेपर मनुष्यके जिस बर्तावका दूसरे लोग भी आश्रय लेते हैं, संकटमें पड़ जानेपर उसी मनुष्यके उसी बर्तावको उसके स्वजन भी नहीं सहन करते हैं
yad vṛttam upajīvanti prakṛtisthasya mānavāḥ | tadeva viṣamasthasya svajano 'pi na mṛṣyate ||
قال فاماديفا: «إن السلوكَ الذي يعتاش به الناس حين يكون الرجل في حالته الطبيعية المزدهرة—بل إن الآخرين أيضًا يلجؤون إلى ذلك السلوك—يصبح غير محتمل إذا سقط ذلك الرجل في الشدة؛ وحينئذٍ لا يطيقه حتى ذوو قرباه.»
वामदेव उवाच