यमाहुर्जगत: कोशं यस्मिन् संनिहिता: प्रजा: । यस्मिल्लोका: स्फुरन्तीमे जले शकुनयो यथा,जो एक होकर भी अनेक रूपोंमें प्रकट हुए हैं, जो इन्द्रियों और उनके विषयोंसे ऊपर उठे होनेके कारण “अधोक्षज” कहलाते हैं, उपासकोंकी समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाले हैं, यज्ञादि कर्म और पूजनमें लगे हुए अनन्य भक्त जिनका यजन करते हैं, जिन्हें जगत्का कोषागार कहा जाता है, जिनमें सम्पूर्ण प्रजाएँ स्थित हैं, पानीके ऊपर तैरनेवाले जलपक्षियोंकी तरह जिनके ही ऊपर इस सम्पूर्ण जगतकी चेष्टाएँ हो रही हैं, जो परमार्थ सत्यस्वरूप और एकारक्षर ब्रह्म (प्रणव) हैं, सत् और असत्से विलक्षण हैं, जिनका आदि, मध्य और अन्त नहीं है, जिन्हें न देवता ठीक-ठीक जानते हैं और न ऋषि, अपने मन और इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए सम्पूर्ण देवता, असुर, गन्धर्व, सिद्ध, ऋषि, बड़े-बड़े नागगण जिनकी सदा पूजा किया करते हैं, जो दुःखरूपी रोगकी सबसे बड़ी ओषधि हैं, जन्म- मरणसे रहित, स्वयम्भू एवं सनातन देवता हैं, जिन्हें इन चर्म-चक्षुओंसे देखना और बुद्धिके द्वारा सम्पूर्णरूपसे जानना असम्भव है, उन भगवान् श्रीहरि नारायण देवकी मैं शरण लेता हूँ
bhīṣma uvāca | yam āhur jagataḥ kośaṃ yasmin saṃnihitāḥ prajāḥ | yasmin lokāḥ sphurantīme jale śakunayo yathā |
قال بهيشما: «يسمّونه كنزَ الكون وخزانته، ففيه تجتمع الخلائق وتُحفظ وتُسند. وفيه تخفق العوالم وتتحرّك—كطيور الماء تنزلق وتلهو على سطحه—حتى إن كلّ حركة كونية إنما تقوم عليه بوصفه الدعامة.»
भीष्म उवाच
The verse presents the Supreme as the underlying repository and support of all beings and all worlds: everything lives, moves, and functions while resting upon Him, just as birds move upon water without leaving its surface.
In the Śānti Parva, Bhishma instructs Yudhiṣṭhira on dharma and higher truths; here he shifts into a devotional-philosophical praise, describing the Lord as the cosmic ground in whom all creatures abide and upon whom the worlds’ activity depends.