शान्ति पर्व (अध्याय 38): युधिष्ठिरस्य राजधर्म-जिज्ञासा तथा भीष्मोपसर्पण-प्रस्तावना | Shanti Parva Chapter 38: Yudhishthira’s Inquiry into Rajadharma and the Prelude to Approaching Bhishma
कि तेन स्याद्धि कौन्तेय कृत्वेमं ज्ञातिसंक्षयम् । घातयित्वा गुरूंश्वैव मृतं श्रेयो न जीवितम्,चार्वाक बोला--राजन्! ये सब ब्राह्मण मुझपर अपनी बात कहनेका भार रखकर मेरेद्वारा ही तुमसे कह रहे हैं--“कुन्तीनन्दन! तुम अपने भाई-बन्धुओंका वध करनेवाले एक दुष्ट राजा हो। तुम्हें धिक्कार है! ऐसे पुरुषके जीवनसे क्या लाभ? इस प्रकार यह बन्धु- बान्धवोंका विनाश करके गुरुजनोंकी हत्या करवाकर तो तुम्हारा मर जाना ही अच्छा है, जीवित रहना नहीं”
ki tena syād dhi kaunteya kṛtvemaṁ jñātisaṁkṣayam | ghātayitvā gurūṁś caiva mṛtaṁ śreyo na jīvitam ||
قال تشارفَاكا: «يا ابنَ كونتي، أيُّ خيرٍ يُرجى من هذا؟ لقد جلبتَ الهلاكَ على ذوي قرباك، وتسبّبتَ في قتلِ الشيوخِ والأساتذةِ أيضًا؛ فالموتُ لك خيرٌ من أن تواصلَ الحياة».
चारवक उवाच