धर्मद्वारबहुत्वविमर्शः — Reflection on the Many ‘Doors’ of Dharma (Śānti-parva 342)
नारायणाय विश्वाय निर्गुणाय गुणात्मने । तात! मैं तुमसे उन नामोंकी व्युत्पत्ति बताता हूँ, क्योंकि पूर्वकालसे ही तुम मेरे आधे शरीर माने गये हो। जो समस्त देहधारियोंके उत्कृष्ट आत्मा हैं, उन महायशस्वी, निर्मुण सगुणरूप विश्वात्मा भगवान् नारायणदेवको नमस्कार है
السلامُ والخضوعُ لنارايانا: الكلّ الكونيّ، المتعالي عن الصفات (نيرغونا) ومع ذلك هو جوهرُ الصفات كلّها (غوناطما)، روحُ العالم.
अर्जुन उवाच