धर्मद्वारबहुत्वविमर्शः — Reflection on the Many ‘Doors’ of Dharma (Śānti-parva 342)
अपन का छा | अप्-७#रात जा - पशुवधसे यहाँ क्या अभिप्राय है, ठीक समझमें नहीं आया। एकचत्वारिशदधिकत्रिशततमो< ध्याय: भगवान् श्रीकृष्णका अर्जुनको अपने प्रभावका वर्णन करते हुए अपने नामोंकी व्युत्पत्ति एवं माहात्म्य बताना जनमेजय उवाच अस्तौषीद् यैरिमं व्यास: सशिष्यो मधुसूदनम् । नामभिवीविधैरेषां निरुक्ते भगवन् मम,जनमेजयने कहा--भगवन्! शिष्योंसहित महर्षि व्यासने जिन नाना प्रकारके नामोंद्वारा इन मधुसूदनका स्तवन किया था, उनका निर्वचन (व्युत्पत्ति) मुझे बतानेकी कृपा करें। मैं प्रजापतियोंके पति भगवान् श्रीहरिके नामोंकी व्याख्या सुनना चाहता हूँ; क्योंकि उन्हें सुनकर मैं शरच्चन्द्रके समान निर्मल एवं पवित्र हो जाऊँगा
janamejaya uvāca | astauṣīd yair imaṃ vyāsaḥ saśiṣyo madhusūdanam | nāmabhir vividhais teṣāṃ nirukte bhagavan mama |
قال جاناميجايا: «أيها المبارك، تفضّل فاشرح لي اشتقاقات تلك الأسماء المتعددة ومعانيها المقصودة، التي بها أثنى الحكيم العظيم فياسا، مع تلاميذه، على مدهوسودانا. إني أرغب في سماع بيان أسماء الربّ هاري، سيّد البراجابتي؛ فبسماعها أصير طاهرًا نقيًّا، صافياً كقمر الخريف.»
जनमेजय उवाच