देवतापितृप्रश्नः — Nārada at Badarīāśrama: the ultimate referent of daiva and pitṛ worship
जो लोग तपोवनोंमें पैदा हुए और वहीं मृत्युको प्राप्त हो गये, उन्हें थोड़े-से ही धर्मकी प्राप्ति होती है; क्योंकि वे काम-भोगोंको जानते ही नहीं थे (अतः उन्हें त्यागनेके लिये उनको कष्ट सहन नहीं करना पड़ता) ।। यस्तु भोगान् परित्यज्य शरीरेण तपश्चरेत् । नतेन किंचिन्न प्राप्त तन्मे बहु मतं फलम्,जो भोगोंका परित्याग करके तपोवनमें जाकर शरीरसे तपस्या करता है, उसके लिये कोई ऐसी वस्तु नहीं, जो प्राप्त न हो। वही फल मुझे अधिक जान पड़ता है
vyāsa uvāca | ye lokāḥ tapovaneṣu jāyante tatraiva ca mṛtyuṃ prāpnuvanti, teṣāṃ alpaiva dharmaprāptiḥ; yataḥ te kāma-bhogān na jānanti (ataḥ tyāgāya teṣāṃ duḥkha-sahanaṃ na bhavati) || yas tu bhogān parityajya tapovanaṃ gatvā śarīreṇa tapaś caret | na tena kiñcin na prāptaṃ; tan me bahu mataṃ phalam ||
قال فياسا: إن الذين يولدون في محابس الزهاد في الغابة ويموتون فيها لا ينالون إلا نصيبًا يسيرًا من الدharma، لأنهم لم يعرفوا قط لذّات الحس؛ ولذلك حين يزهدون فيها لا يذوقون مشقة الصراع الباطني الحق. أمّا من عرف المتع ثم تركها عن قصد، ومضى إلى الغابة يمارس التقشّف بالجسد، فلا شيء يعجزه عن نيله. وذلك—في نظري—هو الثمر الأعظم.
व्यास उवाच