Śuka’s Guṇa-Transcendence and Vyāsa’s Consolation (शुकगति-वर्णनम्)
मत्यक्षसंश्रयाच्चायं शृणु यस्ते व्यतिक्रम: । आश्रयन्त्या: स्वभावेन मम पूर्वपरिग्रहम्,आपने स्वभावत: सोच-समझकर मेरे पूर्व-शरीरका आश्रय लेनेकी चेष्टा की है, अतः मेरे पक्षका आश्रय लेने--मेरे शरीरमें प्रवेश करनेके कारण आपसे जो व्यतिक्रम बन गया है, उसे बताता हूँ, सुनिये
اسمعي: إنكِ، لاتّكالكِ على داعي الشهوة، وبحسب طبيعتكِ، قد حاولتِ أن تتخذي من جسدي السابق ملجأً. فبالتجائكِ إلى جانبي—وبدخولكِ في جسدي—نشأ منكِ تعدٍّ؛ وسأبيّنه لكِ، فاسمعي.
जनक उवाच